पश्चिमी देशों और चीन की जारी होड़ के बीच दोनों पक्षों से फायदा उठाने की पाकिस्तान की रणनीति औंधे मुंह गिर गई है। अब जल्द ही उसे यह चुनना होगा कि इन दोनों के बीच उसकी प्राथमिकता कौन है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की सरकार का साफ झुकाव चीन की तरफ था। समझा जाता है कि शहबाज शरीफ के नेतृत्व में पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) की सरकार बनने के बाद अमेरिका की पैठ पाकिस्तान में बढ़ी है।
पाकिस्तान के अखबार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने के मुताबिक पाकिस्तान के वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने आईएमएफ के ताजा शर्त लगाने की पुष्टि की है। अखबार ने अपनी एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में बताया है कि आईएमएफ की शर्त से पाकिस्तान सरकार के सामने कुआं या खाई में से एक में गिरने जैसी हालत पैदा हो गई है। चीनी कंपनियों ने पाकिस्तान में बिजली संयंत्रों का निर्माण चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) के तहत किया है, जिसकी शर्तें अलग से तय हुई थीं। चीनी कंपनियों ने उन शर्तों पर फिर से बातचीत की पाकिस्तान की गुजारिश पहले ही ठुकरा चुकी हैं।
विश्लेषकों के मुताबिक आईएमएफ के फैसलों पर अमेरिका का बड़ा प्रभाव रहता है। ताजा शर्त को इस बात का संकेत समझा जा रहा है कि पाकिस्तान की मौजूदा आर्थिक मुसीबत के बीच अमेरिका ने वहां चीन का प्रभाव घटाने की रणनीति अपनाई है। पाकिस्तान सरकार के साथ बातचीत में आईएमएफ के अधिकारियों ने संदेह जताया कि चीनी कंपनियां पाकिस्तान से बिजली का अधिक शुल्क वसूल कर रही हैं। इसलिए उनसे हुए करार की शर्तें फिर से तय करने की जरूरत है।
वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने एक्सप्रेस ट्रिब्यून को बताया है कि आईएमएफ ने खास एतराज इस बात पर जताया कि पाकिस्तान ने इस वर्ष फरवरी में चीनी कंपनियों को 50 बिलियन डॉलर का भुगतान किया। आईएमएफ का कहना कि इस भुगतान से पहले पाकिस्तान को उन कंपनियों से करार की शर्तों पर दोबारा बातचीत करनी चाहिए थी।
विश्लेषकों का कहना है कि आईएमएफ की आपत्ति से सीपीईसी प्रोजेक्ट में काम की गति धीमी होने से संबंधित चीन की चिंता को दूर करना पाकिस्तान सरकार के लिए और कठिन हो जाएगा। इससे उसे चीन की नाराजगी मोल लेनी पड़ सकती है, जिसे वह अपना ‘हर वक्त में काम आने वाला दोस्त’ बताता रहा है।