रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन संकट पर फिर शांति प्रस्ताव दिया है। उन्होंने कहा कि अभी कुछ ज्यादा बिगड़ा नहीं है, बशर्ते कीव (यूक्रेन) नाटो देशों की सदस्यता का विचार छोड़ दे। पुतिन ने मौजूदा हालात और मिंस्क समझौते से पीछे हटने के हालात के लिए भी कीव को ही जिम्मेदार ठहराया। क्रेमलिन (रूस का राष्ट्रपति भवन) ने एक बार फिर अपने फैसले के साथ खड़े रहने की मजबूती दिखाई है। दूसरी तरफ, अमेरिका ने रूस को यूक्रेन में घुसपैठ के लिए जिम्मेदार ठहराया और कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी।
राष्ट्रपति पुतिन ने कहा कि बहुत अच्छा होता कि यूक्रेन अब नाटो देशों के संगठन में शामिल होने का विचार त्याग दे। यूक्रेन पूरी तरह से हथियारों से मुक्त हो। वह पार्टी न बने और निष्पक्ष देश की तरह व्यवहार करे। राष्ट्रपति ने कहा कि मिंस्क समझौता अब खत्म हो चुका है और इसके लिए कीव (यूक्रेन) जिम्मेदार है। पुतिन ने इसे यूक्रेन के लिए आखिरी मौका बताया है। इसके साथ यह भी जोड़ा है कि वह डोनबास क्षेत्र में किसी तरह का नरसंहार नहीं होने देना चाहते। यह संदेश देकर पुतिन ने यह बताने की कोशिश की है कि वह रूस की सुरक्षा, एकता, अखंडता और इसकी संप्रभुता से किसी भी तरह का समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं। इसके अलावा वह किसी बड़ी जंग के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन स्थितियों ने मजबूर किया तो कोई भी कदम उठाने के लिए तैयार हैं। एक और नया डेवलपमेंट भी हुआ। राष्ट्रपति पुतिन की रूस की संसद ने डोनेत्स्क (डीपीआर) और लुहांस्क (एलपीआर) में सेना तैनात करने की इजाजत दे दी है।
नाटो महासचिव स्टोलेनबर्ग ने सख्त बयानों को देने का सिलसिला जारी रखा है। उन्होंने कहा कि रूस यूक्रेन पर हमले की योजना को अंतिम रूप देने में लगा है। उन्होंने कहा कि हम अभी भी रूस से अपने कदम पीछे खींचने के लिए कह रहे हैं। इस तनावपूर्ण क्षण में भी अभी यूक्रेन की महत्वाकांक्षा थमने का नाम नहीं ले रही है। विदेश मंत्री दिमित्रो कुलेबा ने कहा कि पश्चिमी देश अंतत: कीव की आवाज सुनेंगे। रूस को गंभीर आर्थिक प्रतिबंधों को भुगतना पड़ेगा। जी-7 के देशों के विदेश मंत्रियों ने रूस द्वारा एलपीआर और डीपीआर को मान्यता देने की निंदा की है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय रूस पर दबाव बनाने की कोशिशों में जुट गया है।
मिंस्क समझौता, युद्ध विराम का समझौता है। हालांकि यह कभी कारगर नहीं हो सका। यह समझौता यूक्रेन, रूस और यूरोपीय संस्था ओएससीआई के बीच में हुआ था। पहली बार यह 2014 में डोनेत्स्क और लुहांस्क में अलगाववादी आंदोलन को शांतिपूर्व खत्म करने के इरादे से किया गया था। इसमें सभी पक्षों के सहमत होने, हस्ताक्षर करने के बाद भी युद्ध विराम में सफलता नहीं मिल पाई थी। इसके बाद मिंस्क-2 समझौता भी हुआ, लेकिन इस समझौते के बाद भी युद्ध विराम के आसार नहीं बन पाए। यूक्रेन के विद्रोही इस क्षेत्र पर अपना कब्जा जमाने और उसे स्वतंत्र घोषित कराने के प्रयास में लगे रहे। लेकिन यह मान लिया गया कि मिंस्क-2 में बनी सहमति ही भविष्य में समाधान निकालने वाली कोशिशों का आधार बनेगी। इस समझौते के सफल न हो पाने की सबसे बड़ी अड़चन एक शर्त रही। इस शर्त के मुताबिक डोनेत्स्क और लुहांस्क से सभी विदेशी लड़ाकों, सेनाओं, सैन्य उपकरणों को हटाना होगा। यह इसलिए मुमकिन नहीं हो पाया कि इसका सीधा संबंध रूस से था।
यूक्रेन रूस से लगा हुआ देश है। इसकी सीमा सीधे यूरोप में खुलती है। यूक्रेन का डोनबास क्षेत्र रूस के लिए सीधे-सीधे गेट-वे-ऑफ यूरोप है। 65 फीसदी आबादी ईसाई धर्म से है। यहां सरकारी दफ्तरों से लेकर आम बोलचाल में 70 फीसदी से अधिक लोग रूसी भाषा का प्रयोग करते हैं। करीब 39 फीसदी रूसी मूल के लोग भी इस क्षेत्र में हैं। सोवियत संघ रूस के समय में भी यूक्रेन का अच्छा विकास हुआ था। इस क्षेत्र के दो शहर एलपीआर और डीपीआर में रूस समर्थक यूक्रेन विद्रोहियों की स्थिति काफी मजबूत है। डोनबास का यह क्षेत्र कोन माइनिंग, हैवी इंडस्ट्री, रूस की यूक्रेन से होकर जाने वाली गैस पाइप लाइन, हाइड्रोकार्बन पाइप लाइन आदि के लिए जाना जाता है।