जर्मनी के यूनिवर्सिटी ऑफ हैम्बर्ग की नई स्टडी में पाया गया है कि अचानक पैदा हुआ तनाव दिमाग की पुरानी यादों को नई जानकारी से जोड़ने की क्षमता को कमजोर कर देता है। एफएमआरआई स्कैन में तनावग्रस्त लोगों के दिमाग में गतिविधि कम पाई गई। वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे निर्णय लेने और तार्किक निष्कर्ष निकालने की क्षमता प्रभावित होती है। यह अध्ययन मानसिक स्वास्थ्य को समझने में अहम माना जा रहा है।
तेज तनाव सिर्फ इंसान को मानसिक रूप से परेशान नहीं करता, बल्कि यह दिमाग की सोचने, समझने और पुरानी यादों को जोड़ने की क्षमता को भी कमजोर कर सकता है। जर्मनी के यूनिवर्सिटी ऑफ हैम्बर्ग की नई स्टडी में यह खुलासा हुआ है कि अचानक पैदा होने वाला तनाव यानी एक्यूट स्ट्रेस दिमाग में यादों के बीच बनने वाले संबंधों को प्रभावित करता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यही कारण है कि तनाव की स्थिति में इंसान सही फैसले लेने और तार्किक निष्कर्ष निकालने में कमजोर पड़ने लगता है। यह अध्ययन मानसिक स्वास्थ्य और दिमाग की कार्यप्रणाली को समझने के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।
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आखिर तनाव दिमाग को कैसे प्रभावित करता है?
शोधकर्ताओं ने पाया कि जब कोई व्यक्ति तनाव में होता है, तब उसका दिमाग नई जानकारी को पुरानी यादों से सही तरीके से जोड़ नहीं पाता। सामान्य परिस्थितियों में दिमाग पुरानी यादों को दोबारा सक्रिय करके नई चीजों को समझने में मदद करता है। लेकिन तनाव की स्थिति में यह प्रक्रिया कमजोर हो जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यही वजह है कि तनाव के समय लोग कई बार उलझन में पड़ जाते हैं और निर्णय लेने में कठिनाई महसूस करते हैं।
एफएमआरआई स्कैन में क्या सामने आया?
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने प्रतिभागियों के दिमाग की गतिविधियों को समझने के लिए एफएमआरआई यानी फंक्शनल मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग तकनीक का इस्तेमाल किया। जांच में पाया गया कि तनावग्रस्त लोगों के हिप्पोकैम्पस में वह गतिविधि कम हो गई थी, जो सामान्य तौर पर चेहरे और दृश्यों से जुड़ी यादों के दौरान सक्रिय रहती है। इसका मतलब यह हुआ कि उनका दिमाग नई जानकारी को पुरानी यादों से मजबूती से जोड़ नहीं पा रहा था। वैज्ञानिकों ने कहा कि तनाव दिमाग के उन हिस्सों को प्रभावित करता है, जो याददाश्त और सोचने की क्षमता से जुड़े होते हैं।
क्या व्यवहारिक प्रदर्शन पर भी असर दिखा?
दिलचस्प बात यह रही कि व्यवहारिक परीक्षणों में तनावग्रस्त लोगों का प्रदर्शन बहुत कमजोर नहीं दिखा। वे कई मामलों में सही जवाब देने में सफल रहे। हालांकि एफएमआरआई स्कैन में उनके दिमाग के भीतर यादों का जुड़ाव कमजोर दिखाई दिया। वैज्ञानिकों का मानना है कि दिमाग के अंदर होने वाले सूक्ष्म बदलाव कई बार सामान्य व्यवहार में तुरंत दिखाई नहीं देते, लेकिन स्कैनिंग तकनीक उन्हें पकड़ सकती है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि तनाव अंदर ही अंदर दिमाग को कैसे प्रभावित करता है।
इस अध्ययन को क्यों माना जा रहा है अहम?
विशेषज्ञों के मुताबिक यह अध्ययन मानसिक तनाव और दिमाग की कार्यप्रणाली को समझने में बड़ा कदम माना जा रहा है। यूनिवर्सिटी ऑफ ओरेगन के न्यूरोसाइंटिस्ट ब्राइस कूल ने कहा कि व्यवहारिक परीक्षण और न्यूरल इमेजिंग को साथ जोड़कर दिमाग की वास्तविक स्थिति को समझना बेहद प्रभावशाली तरीका है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस रिसर्च से भविष्य में तनाव, मानसिक दबाव और स्मृति से जुड़ी समस्याओं के इलाज में मदद मिल सकती है।