कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित एक नई तकनीक ने उन पुरुषों के लिए उम्मीद की किरण जगा दी है जिन्हें बांझ घोषित कर दिया गया था। अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी की स्पर्म ट्रैक एंड रिकवरी (स्टार)प्रणाली ऐसे मामलों में भी शुक्राणु खोज पा रही है, जहां पारंपरिक जांच में एक भी शुक्राणु नहीं मिलता। इस तकनीक की मदद से कई दंपतियों को वर्षों बाद माता-पिता बनने का सुख मिला है।
बीबीसी के अनुसार अमेरिका के न्यू जर्सी की एक महिला, जिन्हें रिपोर्ट में पेनेलोप नाम से संबोधित किया गया है, नवंबर 2025 में तब भावुक हो गईं जब डॉक्टर ने उन्हें गर्भवती होने की खबर दी। करीब ढाई साल की असफल कोशिशों के बाद यह संभव हो सका। रिपोर्ट के अनुसार उनके पति को क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम नाम की आनुवंशिक बीमारी थी, जिसमें पुरुषों में अतिरिक्त एक्स क्रोमोसोम होता है और आमतौर पर शुक्राणु बनना बेहद कम या शून्य होता है। डॉक्टरों ने पहले ही साफ कर दिया था कि उनके पति के जैविक पिता बनने की संभावना लगभग नहीं के बराबर है। लेकिन स्टार तकनीक ने उनके नमूने में छिपे कुछ शुक्राणु खोज निकाले, जिनकी मदद से इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) यानी शरीर के बाहर निषेचन की प्रक्रिया सफल हुई। स्टार प्रणाली एआई और मशीन लर्निंग का उपयोग करके बेहद दुर्लभ शुक्राणुओं को पहचानती है।
माइक्रोफ्लूडिक चिप का होता है उपयोग
सामान्यतः एक मिलीलीटर वीर्य में लाखों शुक्राणु होते हैं, लेकिन एजूस्पर्मिया नामक स्थिति में एक भी शुक्राणु मिलना मुश्किल होता है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें पुरुष के वीर्य में शुक्राणु नहीं के बराबर होते हैं। इस तकनीक में माइक्रोफ्लूडिक चिप का उपयोग होता है। यह एक बेहद पतली नलिकाओं वाला उपकरण होता है, जिसमें से नमूना गुजरता है। इसके साथ हाई-स्पीड इमेजिंग सिस्टम प्रति सेकंड सैकड़ों तस्वीरें लेता है और एआई एल्गोरिदम उनमें से शुक्राणु की पहचान करता है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी फर्टिलिटी सेंटर के निदेशक जेव विलियम्स के अनुसार, यह ऐसे है जैसे मलबे के समुद्र में एक बेहद दुर्लभ कण को ढूंढना। एआई यह काम कुछ मिलीसेकंड में कर देता है, जबकि इंसान के लिए यह लगभग असंभव होता है।
30 फीसदी मामलों में मिली है सफलता
रिपोर्ट के अनुसार इस तकनीक के उपयोग से पिछले साल पहला बच्चा जन्मा, जो लगभग दो दशक से बांझपन से जूझ रहे एक दंपति के लिए बड़ी सफलता थी। अब तक 175 मरीजों पर किए गए परीक्षणों में करीब 30 प्रतिशत मामलों में शुक्राणु खोजने में सफलता मिली है। इतना ही नहीं, यह तकनीक पारंपरिक मानव जांच की तुलना में 40 गुना अधिक शुक्राणु खोजने में सक्षम रही है। आईवीएफ प्रक्रिया में हार्मोन की सही मात्रा तय करने, अंडाणु और भ्रूण की गुणवत्ता का आकलन करने में भी मशीन लर्निंग का उपयोग बढ़ रहा है। इससे उपचार को अधिक व्यक्तिगत और प्रभावी बनाने में मदद मिल रही है।
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