दिसंबर 2019 में इस खबर की दुनिया भर में चर्चा हुई थी कि रूस ने अपने अलग ऑनलाइन नेटवर्क का सफल परीक्षण कर लिया है। बताया गया था ये नेटवर्क देश के अंदर मौजूद सर्वरों पर निर्भर करेगा। तब भी रूस सरकार के सूत्रों ने कहा था कि इसे आपात स्थिति के लिए तैयार किया गया है। खास कर उन स्थितियों के लिए जब रूस और पश्चिमी देशों में सैनिक टकराव की स्थिति आ जाए। उस समय रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा था कि एक स्वतंत्र इंटरनेट और एक संप्रभु इंटरनेट बिल्कुल अलग धारणाएं नहीं हैं। उन्होंने कहा था कि रूस का मकसद उन हालात के लिए तैयार रहना है, जब मुमकिन है कि वैश्विक वेब से उसे काट दिया जाए।
उन बयानों के बाद दुनिया का ध्यान कोरोना महामारी में लग गया। अब जानकारों का कहना है कि मेदविदेव के ताजा बयान से एक बार फिर इस मसले की तरफ ध्यान गया है। मेदविदेव ने यह भी कहा कि आज के दौर में इंटरनेट का संबंध पूरी राज्य-व्यवस्था के संचालन से है। इसका संबंध बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यों से है। इसलिए हम इसे अपने नियंत्रण से बाहर नहीं छोड़ सकते। इसलिए रूस ने इसके लिए कानूनी व्यवस्था की है, जिसे अब लागू किया जाएगा।
जानकारों का कहना है कि जिस तरह सोशल मीडिया कंपनियों ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एकाउंट्स बंद किए, उससे रूस में गहरी चिंता पैदा हुई। यहां उसे ट्विटर, फेसबुक, गूगल जैसी कंपनियों की सेंसरशिप बताया गया। रूस ने एक आधिकारिक बयान में कहा कि इस कदम से पश्चिमी देशों की लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था के दावों की धज्जियां उड़ गई हैं। विश्लेषकों के मुताबिक उससे यहां चिंता पैदा हुई कि अमेरिकी कंपनियां कभी ऐसे कदम रूसी सरकार और रूसी नेताओं के मामले भी उठा सकती हैं। इसलिए अब अपने इंटरनेट को सक्रिय करने पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है।
मेदविदेव ने भी कहा कि कुछ विदेशी वेबसाइट रूस के खिलाफ प्रॉक्सी वॉर चला रहे हैं। पुतिन विरोधी नेता अलेक्सी नवालनी की गिरफ्तारी को लेकर पश्चिमी देशों में जैसा प्रचार अभियान छिड़ा हुआ है, मेदविदेव के बयान को उस संदर्भ में भी देखा गया है। ऐसे में रूस में अलग इंटरनेट चलने की संभावना मजबूत हो गई है। चीन में पहले से वर्ल्ड वाइड वेब पर कई प्रतिबंध हैं। अब रूस भी उस दिशा में बढ़ रहा है, तो ये आशंका पैदा हुई है कि जिस तकनीक ने कभी दुनिया को जोड़ा था, अब वह खंडित होने की राह पर है।