नेपाल ने यूक्रेन पर हमले के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र महासभा में लाए गए रूस की निंदा के प्रस्ताव के पक्ष में वोट डाला। दक्षिण एशिया में नेपाल के अलावा ऐसा रुख सिर्फ मालदीव का रहा। भारत, श्रीलंका, और पाकिस्तान ने अपने को मतदान से अलग रखा। हालांकि औपचारिक रूप से अफगानिस्तान और म्यांमार को प्रस्ताव के पक्ष में वोट डालने वाले देशों की सूची में दिखाया गया, लेकिन संयुक्त राष्ट्र में अभी तक प्रतिनिधित्व उन सरकारों को मिला हुआ है जो अब वहां वास्तव में सत्ता नहीं हैं। वरना, म्यांमार के सैनिक शासकों ने खुल कर रूस का समर्थन किया है, जबकि अफगानिस्तान में सत्ताधारी तालिबान के रूस से बेहतर रिश्ते बताए जाते हैं।
नेपाल उन 141 देशों में शामिल हुआ, जिन्होंने निंदा प्रस्ताव के पक्ष में वोट डाले। मतदान से पहले चर्चा में भाग लेते हुए संयुक्त राष्ट्र में नेपाल के स्थायी प्रतिनिधि अमृत राय ने कहा कि उनका देश किसी संप्रभु देश के खिलाफ ताकत के इस्तेमाल और उसकी प्रादेशिक अखंडता के उल्लंघन के खिलाफ है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में चर्चा शुरू होने के पहले अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा को फोन किया था। ब्लिंकेन ने उसके बाद एक ट्विट में बताया था कि उन्होंने देउबा से यूक्रेन पर हमले की चर्चा की और इस मुद्दे पर उनका समर्थन मांगा।
विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि यह नेपाल की विदेश नीति में एक स्पष्ट बदलाव है। 2014 में जब क्राइमिया को रूस में मिलाए जाने के बाद संयुक्त राष्ट्र में निंदा प्रस्ताव लाया गया था, तब नेपाल ने खुद को मतदान से अलग रखा था। अभी पिछले साल जून तक नेपाल का रुख संतुलन बना कर चलने का था। बीते जून में म्यांमार के सैनिक शासन की निंदा के लिए महासभा में प्रस्ताव लाया गया था। तब नेपाल ने उस पर हुए मतदान से खुद को अलग रखा था।