नेपाल में सत्ता परिवर्तन और संसद भंग करने को लेकर उठे राजनीतिक विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। अदालत ने प्रतिनिधि सभा को भंग करने के खिलाफ मांगी गई अंतरिम रोक को खारिज कर दिया है। हालांकि, कोर्ट ने राष्ट्रपति कार्यालय सहित अन्य प्रतिवादियों से इस फैसले पर लिखित जवाब मांगा है। यह मामला नेपाल की राजनीति में एक बार फिर अस्थिरता का संकेत दे रहा है।
नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को वर्तमान अंतरिम सरकार के गठन और प्रतिनिधि सभा के विघटन के खिलाफ दायर याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने याचिकाकर्ताओं की उस मांग को अस्वीकार कर दिया जिसमें संसद भंग करने पर तत्काल रोक लगाने की गुहार लगाई गई थी। कोर्ट ने राष्ट्रपति कार्यालय सहित सरकार से पूछा है कि अंतरिम आदेश क्यों न दिया जाए। अदालत ने सभी पक्षों को एक सप्ताह के भीतर लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
अंतरिम प्रधानमंत्री से जेन-जी और अन्य राजनीतिक पक्षों की मुलाकात
इसी बीच नेपाल की अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने बुधवार को त्रिपक्षीय बैठक में जेन जी प्रतिनिधियों से बातचीत की। जेन-जी ने पीएम से भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और देश में सुशासन सुनिश्चित करने की मांग की। बैठक में सरकार, राजनीतिक दलों और जेन जी समूह के कई प्रतिनिधि मौजूद रहे। यह चर्चा मुख्य रूप से 5 मार्च को प्रस्तावित आम चुनाव, भ्रष्टाचार, सुशासन और 8–9 सितंबर को हुए जेन जी आंदोलन के दौरान जान-माल के नुकसान के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई के मुद्दों पर केंद्रित रही। जेन जी प्रतिनिधियों ने कहा कि समय पर संसदीय चुनाव जरूरी हैं, लेकिन केवल चुनाव कराना ही पर्याप्त नहीं होगा। प्रधानमंत्री कार्की ने कहा कि देश का निर्माण और विकास युवाओं के हाथों में है और संवाद की प्रक्रिया लगातार जारी रहनी चाहिए।
सरकार गठन की पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब जनरेशन जेड आंदोलन के दबाव में पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने नौ सितंबर को इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद 12 सितंबर को राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त किया और प्रतिनिधि सभा को भंग कर दिया। प्रधानमंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति ने पांच मार्च 2026 को आम चुनाव कराने की घोषणा की थी। इस कदम ने देश में संवैधानिक बहस और राजनीतिक विरोध को हवा दे दी।
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याचिकाओं और कानूनी दलीलों की स्थिति
सरकार गठन और प्रतिनिधि सभा के विघटन के खिलाफ अब तक एक दर्जन से अधिक रिट याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं। इन याचिकाओं में राष्ट्रपति कार्यालय को भी प्रतिवादी बनाया गया है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश को प्रधानमंत्री बनाना संविधान के विरुद्ध है।
वरिष्ठ अधिवक्ता टिकराम भट्टराई, नेपाल बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष गोपाल कृष्ण घिमिरे और अधिवक्ता खम्मा बहादुर खाती ने अदालत से कहा कि यह सरकार “असंवैधानिक” है और इसे कोई दीर्घकालिक निर्णय लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
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न्यायालय की संवैधानिक पीठ और अगला कदम
मुख्य न्यायाधीश प्रकाशमान सिंह राउत की अध्यक्षता में गठित संवैधानिक पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति सपना प्रधान मल्ला, कुमार रेग्मी, हरि प्रसाद फुन्याल और डॉ. मनोज कुमार शर्मा शामिल थे। अदालत अब प्रतिवादियों के जवाब आने के बाद अगली सुनवाई में यह तय करेगी कि संसद विघटन और सरकार गठन संविधान के अनुरूप है या नहीं। इस फैसले का असर नेपाल के आगामी आम चुनाव और राजनीतिक स्थिरता पर गहरा पड़ सकता है।