नेपाल के सियासी हलकों में ये खबर तैरने लग गई हैं कि प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के सह अध्यक्ष पुष्प कमल दहल प्रचंड के बीच कोई गुप्त समझौता हुआ है, जिससे अचानक प्रचंड का रुख नरम पड़ गया और ओली के इस्तीफे की मांग अचानक बंद हो गई।
सूत्र बताते हैं कि ओली ने प्रचंड को पार्टी का अध्यक्ष पद अकेले संभालने को कहा है और वो खुद ये पद छोड़ने को राजी हो गए हैं। अभी तक ओली विरोधी उनके प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष दोनों ही पद से इस्तीफा देने की मांग कर रहे थे।
दरअसल दो साल पहले जब ओली के नेतृत्व वाली सीपीएन-यूएमएल और प्रचंड के नेतृत्व वाली सीपीएन (माओइस्ट सेंटर) का विलय हुआ और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी अस्तित्व में आई तब दोनों ही नेताओं के सामने पद को लेकर ये समझौता हुआ कि नई पार्टी के दो अध्यक्ष रहेंगे – प्रचंड और ओली।
साथ ही प्रधानमंत्री पद भी दोनों नेता आधे-आधे कार्यकाल के लिए संभालेंगे। यह व्यवस्था बेहतर माहौल में डेढ़-दो साल चली भी। लेकिन जब प्रचंड खेमा को लगा कि ओली प्रधानमंत्री पद छोड़ने के अपने वादे से मुकरने लगे हैं और सत्ता और पार्टी दोनों पर ही मनमाने तरीके से अपना कब्जा कर रहे हैं, तभी से ये विवाद शुरू हुआ और सत्ता की जंग ने पार्टी के लिए गंभीर स्थितियां पैदा कर दीं।
हालत ये हो गई कि दोनों नेता एक दूसरे के खिलाफ खुल कर बोलने भी लगे और सार्वजनिक मंचों पर आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। ओली विरोधी खेमा इतना सक्रिय हुआ कि लगा कि अब ओली को इस्तीफा देना ही पड़ेगा।
लेकिन ऐसी स्थिति में पार्टी के टूटने की भी नौबत आने लगी थी। ऐसे में प्रचंड को पार्टी नेताओं ने ये समझाया कि इससे पार्टी की बदनामी हो रही है, जिसका फायदा दूसरी पार्टियां उठा सकती हैं और इतनी मुश्किलों से इतनी जबरदस्त जीत के साथ जो सत्ता मिली है, उसके लिए खतरा पैदा हो सकता है।
इसलिए पार्टी की कई बैठकें हुईं, अंतर्विरोध खुल कर उभरे और मीडिया में तरह तरह की अटकलें लगती रहीं। आखिरकार तय ये हुआ कि पार्टी के हितों का ध्यान रखते हुए दोनों नेता अपने अंतर्विरोध खुद सुलझाएं और कोई बीच का रास्ता निकालें।
अपने खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों से परेशान ओली ने खुल्लमखुल्ला पार्टी तोड़ने और अलग पार्टी बनाने तक की धमकी दे डाली थी, ऐसे में पार्टी के भीतर का युवा नेतृत्व सामने आया और एक फोरम बनाया गया, जिसने दहल को ये समझाने में कामयाबी पा ली कि अगर ओली ने पार्टी तोड़ी तो ऐसे में दहल का राजनीतिक करियर भी दांव पर लग जाएगा और बगैर ओली के समर्थन के दहल भी अकेले कुछ नहीं कर पाएंगे क्योंकि पार्टी में एक बड़ा गुट ओली का समर्थक है।
शायद ये बात दहल को समझ में आ गई और 18 जुलाई को दोनों नेताओं ने मिलकर सुलह का रास्ता अपना लिया। दूसरी तरफ पार्टी की स्टैंडिंग कमेटी की पहले सात बार टाली जा चुकी बैठक 21 जुलाई को हुई तो जरूर लेकिन उसमें पहले की तरह ओली के इस्तीफे की मांग नहीं उठी।
बैठक में नेपाल में बाढ़ के बिगड़ते हालात और कोरोना जैसे संकट के मुद्दों पर चर्चा हुई और इन संकटों से सरकार और पार्टी को मिलकर लड़ने की बात पर सहमति बन गई। ये बैठक भी पूरी नहीं हो सकी और इसे 28 जुलाई तक के लिए फिर टाल दिया गया।
माना ये जा रहा है कि ओली और प्रचंड के बीच हुई बैठक में ये फैसला हो चुका है कि पार्टी का अधिवेशन दिसंबर में बुलाया जाएगा और उसमें ओली खुद अध्यक्ष का पद पूरी तरह छोड़कर पार्टी के संविधान में बदलाव कर पार्टी का एक ही अध्यक्ष बनाए जाने का फैसला करेंगे और वह अध्यक्ष पद प्रचंड को सौंपा जाएगा। तब तक के लिए प्रचंड खेमा ओली सरकार का समर्थन करेगा और इस्तीफे की मांग नहीं उठाई जाएगी।