संसद के निचले सदन को भंग कराने के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के फैसले के खिलाफ साझा अभियान से मुख्य विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस ने दो रोज पहले अपने को अलग कर लिया था। तब से उसके रुख में आए बदलाव पर अटकलें लगाई जा रही हैं। ताजा अनुमान यह है कि नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा और केपी शर्मा ओली ने हाथ मिला लिया है। अब अटकलें लगाई जा रही हैं कि ओली गुट के समर्थन से देउबा प्रधानमंत्री बनने की रणनीति पर चल रहे हैं।
नेपाली कांग्रेस नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के पुष्प कमल दहल गुट की ये अपील ठुकरा चुकी है कि सदन भंग करने के खिलाफ छेड़े गए साझा अभियान में वह भागीदारी करे। नेपाली कांग्रेस के इस फैसले के बाद दहल गुट के नेता दिलेंद्र प्रसाद बाडू ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री देउबा की हाल की कुछ गतिविधियां संदिग्ध रही हैं।
जानकारों का कहना है कि देउबा को अपनी पार्टी में भी कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। नेपाली कांग्रेस का महाधिवेशन अगले 19-22 फरवरी तक होगा। देउबा उसमें फिर से पार्टी अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। लेकिन उनका विरोधी खेमा उनके इस इरादे को चुनौती दे रहा है।
विश्लेषकों का कहना है कि सदन भंग कराने का ओली का फैसला देउबा के लिए एक वरदान की तरह आया। अब अगर सुप्रीम कोर्ट ने सदन बहाल करने का आदेश दिया, तो मुमकिन है कि ओली गुट के समर्थन से देउबा प्रधानमंत्री बन जाएं। अगर सुप्रीम कोर्ट ने सदन भंग करने को उचित ठहरा दिया, तब देश चुनाव के मोड में चला जाएगा। उस हाल में नेपाली कांग्रेस का महाधिवेशन शायद स्थगित हो जाएगा। इस तरह पार्टी का नेतृत्व देउबा के हाथ में बना रहेगा।
स्थानीय मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक जब नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के दोनों गुटों का झगड़ा बढ़ रहा था, उन दिनों ओली और देउबा के बीच कई मुलाकातें हुईं। आरोप यह भी है कि पिछले तीन साल में देउबा प्रधानमंत्री ओली के “सबसे विश्वस्त सहयोगी' रहे हैं।
अखबार काठमांडू पोस्ट की एक खबर के मुताबिक जब ओली ने संवैधानिक परिषद अधिनियम अध्यादेश पेश किया, तो देउबा को उसकी पहले से जानकारी थी। ये बात अखबार ने अपने सूत्रों के हवाले से छापी है। इस बात की भनक दहल गुट को भी थी।
सदन भंग करने के खिलफ साझा अभियान के समर्थक नेपाली कांग्रेस के नेता गगन थापा ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया है कि ओली और देउबा के बीच सत्ता की साझेदारी पर बातचीत चल रही है। लेकिन थापा ने कहा कि यह होना तभी संभव है, अगर सदन को बहाल करने का आदेश सुप्रीम कोर्ट देगा। लेकिन देउबा के करीबी नेताओं ने इस बारे में लगाई जा रही अटकलों को बेबुनियाद बताया है। ओली के करीबी नेता और विदेश मंत्री प्रदीप गयवाली ने भी ऐसी चर्चाओं को गैर-जरूरी अटकलबाजी कहा है।
यहां के कुछ विश्लेषक देउबा के ताजा रुख के पीछे भारत का हाथ भी देखते हैं। नेपाली कांग्रेस की नीति हमेशा से भारत के हक में झुकी रही है। अब ओली चीन की मंशा को ठुकराते हुए दिख रहे हैं। ऐसे में देउबा की उनसे करीबी के पीछे इस कोण भी देखा जा रहा है।
उधर माना जा रहा है कि अब चीन का दांव दहल और माधव कुमार नेपाल गुट के ऊपर है। एक ताजा खबर के मुताबिक चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के चार सदस्यीय दल के नेपाल से लौटने के बावजूद चीनी दूत नेपाल में मौजूद हैं। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का दल पार्टी के अंतरराष्ट्रीय विभाग के उप मंत्री गुओ येझाउ के नेतृत्व में आया था।
उसे नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में एकता कराने में सफलता नहीं मिली। तब वह पिछले हफ्ते बुधवार को बीजिंग लौट गया। लेकिन यहां पर्यवेक्षकों का कहना है कि गुओ के नेतृत्व में आया दल चीन का औपचारिक प्रतिनिधिमंडल था। उसके बाद भी चीनी दूत यहां मौजूद हैं और यहां के नेताओं से संपर्क बनाए हुए हैँ।