नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड'
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नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया है कि देश में सभी पूर्व माओवादी ताकतों को एकजुट करने की कोशिश चल रही है। दहल फिलहाल उस गठबंधन की सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसमें सबसे बड़ी पार्टी नेपाली कांग्रेस है। दहल की पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओइस्ट सेंटर) मौजूदा संसद में तीसरे नंबर की पार्टी है।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक कुछ समय पहले दहल ने कई वामपंथी दलों के साथ मिल कर सोशलिस्ट फ्रंट का गठन किया था। उससे सत्ताधारी गठबंधन में अविश्वास पैदा हुआ। अब उन्होंने सभी माओवादी ताकतों को एकजुट करने की बात की है। विश्लेषकों के मुताबिक दहल की पार्टी माओइस्ट सेंटर इस समय गहरे राजनीतिक संकट में है। पिछले वर्ष हुए आम चुनाव में उसे पहले की तुलना में काफी कम सीटें मिलीं। 275 संसदीय प्रतिनिधि सभा में वह सिर्फ 32 सीटें जीत पाई। जबकि 2017 के आम चुनाव में उसे 52 सीटें मिली थीं। आम समझ है कि अपनी घटी ताकत के कारण ही दहल कई तरह की चालें चल रहे हैं।
पिछले महीने प्रधानमंत्री की पहल पर माओइस्ट सेंटर, माधव कुमार नेपाल के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूनिफाइड सोशलिस्ट), उपेंद्र यादव के नेतृत्व वाली जनता समाजवादी पार्टी और नेत्र विक्रम चंद के नेतृत्ववाली कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल ने मिलकर सोशलिस्ट फ्रंट का गठन किया था। तब से यह चर्चा तेज रही है कि दहल इस फ्रंट को लेकर केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) के साथ गठबंधन करने के लिए बातचीत कर रहे हैं। इससे नेपाली कांग्रेस में बेचैनी देखी गई है।
सोशलिस्ट फ्रंट के गठन के साथ अब सत्ताधारी गठबंधन में दहल की स्थिति मजबूत हुई है। प्रतिनिधि सभा में फ्रंट के 52 सदस्य हैं। इस बीच अब दहल ने माओवादी ताकतों को एक मंच पर लाने की कोशिश शुरू की है। पर्यवेक्षकों के मुताबिक दहल ने नेत्र विक्रम चंद को बाकी माओवादी गुटों से बातचीत की जिम्मेदारी सौंपी है। चंद पहले दहल के विरोधी थे। उनके सोशलिस्ट फ्रंट में आने को दहल की सफलता के रूप में देखा गया है।
चंद जिन नेताओं से बातचीत करेंगे, उनमें मोहन वैद्य भी हैं। वैद्य पहले दहल के सहयोगी थे, लेकिन गुजरे वर्षों में उन्होंने सार्वजनिक तौर पर आरोप लगाया है कि दहल ने नेपाल की जनता और ‘क्रांति’ के साथ विश्वासघात किया। वैद्य कह चुके हैं कि वे तब तक किसी एकता प्रयास में शामिल नहीं होंगे, जब तक दहल संसदीय राजनीति को नहीं छोड़ते हैँ। दूसरे माओवादी नेताओं का भी दहल के प्रति रुख आक्रामक रहा है।
लेकिन माओइस्ट सेंटर की युवा शाखा के नेता लेखनाथ नेउपाने ने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘मेरी जानकारी के मुताबिक धर्मेंद्र बस्तोला के नेतृत्व वाली पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का बड़ा हिस्सा वैद्य की पार्टी में शामिल हो गया है। ये लोग माओइस्ट सेंटर से हाथ मिलाने के लिए लॉबिंग कर रहे हैं।’
इस बीच इस खबर से सियासी हलकों में चर्चा तेज हो गई है कि पलटी खाने में माहिर दहल माओवादी और कम्युनिस्ट एकता के नाम पर एक बार फिर नेपाली कांग्रेस को धोखा दे सकते हैं।