नेपाल में राजशाही की वापसी की आहट ने विभिन्न सियासी दलों की बेचैनी बढ़ा दी है। राजधानी काठमांडो में रविवार को पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के स्वागत के लिए हजारों की भीड़ उमड़ने के पहले ही सियासी दलों को संभवत: हवा के बदलते रुख का अंदाजा हो गया था। यही वजह है कि मुख्य विपक्षी दल सीपीएन (माओवादी सेंटर) अध्यक्ष पुष्प कमल दहल और अन्य शीर्ष पदाधिकार शनिवार को ही राजधानी लौट आए थे।
राजशाही समर्थकों की रैली के एक दिन बाद सोमवार को माओवादी सेंटर के पदाधिकारियों ने एक आपात बैठक की। इसमें राजशाही समर्थकों की गतिविधियों और देश को फिर हिंदू राष्ट्र का दर्जा देने की बढ़ती मांग पर मंथन किया गया। काठमांडो में पूर्व नरेश के भव्य स्वागत से पहले ही सीपीएन (माओवादी सेंटर) ने तराई-मधेश जिलों में महीने भर चलने वाले जागृति अभियान को अचानक रोक दिया था।
पार्टी की बैठक के बाद प्रचंड ने सोशलिस्ट फ्रंट में शामिल दलों के नेताओं के साथ मुलाकात भी की। इस फ्रंट में माओवादी सेंटर के अलावा सीपीएन (एकीकृत समाजवादी), जनता समाजवादी पार्टी-नेपाल, जनमत पार्टी और नेत्र बिक्रम चंद बिप्लव के नेतृत्व वाली नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी शामिल हैं। राजशाही समर्थकों ने रैली में पूरे उत्साह से नारे लगाए थे-महल खाली करो, हमारे राजा आ रहे हैं। हालांकि, नेपाली सियासी दलों का मानना है कि देश में राजशाही की वापसी की कोई गुंजाइश नहीं है।
हर राज्य में खराब शासन से निराश हैं लोग: सपकोटा
मुख्य विपक्षी दल माओवादी सेंटर की बैठक में शीर्ष नेताओं ने माना कि देश में राजशाही की मांग उठना और स्वागत रैली में बड़ी संख्या में आम लोगों की भागीदारी मौजूदा सरकार की विफलता से उपजी निराशा की अभिव्यक्ति है। माओवादी सेंटर के उपाध्यक्ष और प्रवक्ता अग्नि प्रसाद सपकोटा ने कहा कि लोग हर राज्य निकाय में खराब शासन से निराश हैं। इसके साथ ही उन्होंने प्रगतिशील ताकतों को पूर्व राजा की बढ़ती सक्रियता के प्रति सतर्क रहने के लिए भी आगाह किया।
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विपक्ष बड़े प्रदर्शन की तैयारी में
जनता की नाराजगी और पूर्व नरेश के पक्ष में लामबंदी को देखते हुए विपक्ष दलों का गठबंधन मौजूदा सरकार के खिलाफ व्यापक स्तर पर प्रदर्शन की तैयारी कर रहा है। इसकी तारीख बाद में तय की जाएगी। इस बीच, प्रचंड ने अपनी सियासी सक्रियता बढ़ा दी है। पार्टी पदाधिकारियों के साथ बैठक के बाद वह एकीकृत समाजवादी अध्यक्ष माधव कुमार नेपाल से मिले। नेपाल ने प्रतिक्रियावादी तत्वों के फिर से उभरने के लिए सीपीएन-यूएमएल अध्यक्ष और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को जिम्मेदार ठहराया।
देउबा बोले-राजशाही के पक्ष में कोई लहर नहीं
विपक्ष जहां राजशाही समर्थकों की सक्रियता बढ़ने के लिए मौजूदा सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहा है। वहीं सत्तारूढ़ नेपाली कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेता शेर बहादुर देउबा ने काठमांडो की रैली को नियमित घटना बताया। उन्होंने कहा, मुझे राजशाही के पक्ष में कोई लहर नहीं दिख रही है। प्रधानमंत्री और यूएमएल अध्यक्ष ओली ने भी रविवार के आयोजन को सामान्य बताने की कोशिश की। उन्होंने कहा, इसे बाहरी लोगों का समर्थन प्राप्त है।
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लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती का जवाब क्रांति से दिया जाएग : प्रचंड
नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री व सीपीएन (माओवादी सेंटर) पार्टी के अध्यक्ष पुष्प कमल दहल प्रचंड ने मंगलवार को राजशाही समर्थकों को चेतावनी देते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती देने के किसी भी प्रयास का जवाब क्रांति से दिया जाएगा।
प्रतिनिधि सभा में विशेष संबोधन में मुख्य विपक्षी दल के नेता ने राजशाही समर्थकों को लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर अपनी जगह तलाशने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि मौजूदा गणतंत्र व्यवस्था ने पूर्व राजा को सुरक्षा प्रदान की है। अगर राजशाही समर्थक ताकतें इसे खत्म करने का प्रयास करती हैं, तो उनके जवाब में एक कठोर क्रांति होगी। उन्होंने कहा कि राजशाही समर्थकों की बढ़ती गतिविधियों के पीछे सरकार का खराब प्रदर्शन, देश की अराजक स्थिति और लोगों के मन में अविश्वास है। माओवादी प्रमुख प्रचंड को राजशाही समर्थकों की गतिविधियों के पीछे एक संगठित प्रयास का संदेह है। प्रचंड ने राजशाही के खिलाफ एक दशक तक सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया था। उन्होंने कहा, वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था को खत्म करने के लिए आंतरिक व बाहरी साजिशें हो रही हैं। यह सोचना एक बड़ा भ्रम होगा कि नेपाली लोग जो सत्ता के संप्रभु स्रोत बन गए हैं, राजशाही को स्वीकार करने के लिए गुलाम बन सकते हैं।
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