भारत पर नेपाल की सीमा को लेकर कब्जे का आरोप लगाने वाले पड़ोसी देश के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का उनकी ही पार्टी के साथ चल रहा विवाद और बढ़ गया है। नेपाल की संसद को भंग करने की सिफारिश पर राष्ट्रपति से मुहर लगवाने के दूसरे दिन उनके विरोधियों ने इस फैसले को ‘सांविधानिक चोट’ बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। इस बीच देश में प्रदर्शन भी शुरू हो गए हैं।
ओली के विरोधियों ने संसद को भंग करने और समय पूर्व चुनाव के आह्वान को सांविधानिक चोट करार दिया। इसके बाद कोरोना वायरस से जूझ रहे हिमालयी देश में सियासी उथल-पुथल की आशंका और बढ़ गई है। ओली द्वारा संसद भंग कराने के फैसले के बाद इस्तीफा देने वाले सात मंत्रियों ने कहा कि पीएम का कदम 2017 में जनता द्वारा दिए गए लोकप्रिय जनादेश का उल्लंघन है।
इस बीच, प्रदर्शनकारियों ने नेपाल की गलियों में प्रधानमंत्री के पुतले भी जलाए। उधर, सुप्रीम कोर्ट के प्रवक्ता भद्रकाली पोखरेल ने कहा कि संसद भंग के खिलाफ तीन याचिकाएं पंजीक्रत होने की प्रक्रिया में हैं। याचिकाकर्ताओं में से एक वकील दिनेश त्रिपाठी ने कहा, संविधान के तहत, प्रधानमंत्री के पास संसद को भंग करने के लिए कोई विशेषाधिकार नहीं है। यह सांविधानिक चोट है। मैं अदालत से स्थगन आदेश लेना चाहता हूं।
ओली ने उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का फैसला खारिज किया
नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने उस फैसले को खारिज कर दिया है जिसमें सत्ताधारी पार्टी ने उनके खिलाफ साजिश के तहत संसद भंग करने के फैसले के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई करने को कहा था। ओली ने रविवार को अपने प्रतिद्वंद्वियों पर आश्चर्य जताते हुए उनके और पूर्व प्रमुख पुष्प कमल दहल प्रचंड के बीच सत्ता में लंबे समय से चल रहे विवाद के बीच राष्ट्रपति को संसद भंग करने के लिए कहा था। बता दें कि ओली के इस कदम को नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की स्थायी समिति ने असांविधानिक व अलोकतांत्रिक मानते हुए उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की थी।
ओली का कदम पार्टी एकता को प्रभावित नहीं कर सकता : प्रचंड
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के सह-अध्यक्ष पुष्प कमल दहल प्रचंड ने सोमवार को कहा कि पार्टी एकजुट है और यह किसी भी ऐसे कदम से प्रभावित नहीं होगी जो देश व पार्टी के खिलाफ है। प्रचंड ने कहा, देश में संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य लोगों के बलिदान का नतीजा है और इसकी सुरक्षा हमारा दायित्व है। इसे सुरक्षित रखना कम्युनिस्ट आंदोलनों के भविष्य के लिए जरूरी है।
कोइराला के इतिहास को दोहरा रहे ओली
केपी शर्मा ओली ने जिस तरह संसद को भंग किया, वह पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला द्वारा 1994 में संसद भंग करने की पुनरावृत्ति नजर आ रही है। खास बात है कि कोइराला का उठाया कदम उन्हीं पर भारी पड़ा था। अगर सुप्रीम कोर्ट पुराने रुख पर कायम रहा, तो ओली को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
नया संविधान बनने के बाद 1991 में नेपाल में चुनाव हुए और कोइराला सरकार बनी। इसी तरह ओली सरकार भी नया संविधान बनने के बाद 2018 में बनी। समानता यहीं खत्म नहीं होती, कोइराला की अपनी पार्टी के बाकी नेताओं जैसे गनेश मानसिंह और कृष्ण प्रसाद भट्टाराई से नहीं बनी, उन्होंने संसद में अपनी नीतियां रखीं तो इन्हीं नेताओं ने विरोध किया। इस पर उन्होंने संसद ही भंग करवा दी। ओली का भी अपनी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के पुष्पकमल दहल प्रचंड के गुट से मनमुटाव चलता रहा है, जो संसद भंग करने का मुख्य कारण बना।
मंत्रियों की नियुक्ति के विवाद ने चरम पर पहुंचाया मनमुटाव
संसद भंग करने से पहले कोइराला का विरोधी खेमे के छह मंत्रियों को हटाने का निर्णय तात्कालिक कारण बना। ओली के मामले में तीन मंत्रियों को विरोधी पक्ष के दबाव के बावजूद नियुक्ति देने से खेल बिगड़ा।
अविश्वास प्रस्ताव भी दोनों के खिलाफ आ चुका था
कोइराला के खिलाफ संसद भंग होने से पहले तत्कालीन राजा वीरेंद्र सिंह की सहमति से अविश्वास प्रस्ताव पेश हुआ। ओली सरकार पर रविवार को उन्हीं की पार्टी के सदस्य अविश्वास प्रस्ताव पेश कर चुके थे।
तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा, सरकार बनने की संभावना न होने पर ही चुनाव
कोइराला के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। अदालत ने कहा, अगर सरकार बनने की संभावना नहीं है, तभी चुनाव करवाए जाने चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार मौजूदा मामले में अभी वैकल्पिक सरकार बनने की संभावना है। सुप्रीम कोर्ट अगर पुराने निर्णय पर कायम रही तो चुनाव शायद न हों।
देउबा ने भी भंग की थी संसद, परिणाम राजशाही का खात्मा
इन दोनों की तरह पूर्व प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउबा ने भी 2002 संसद भंग की थी, सैन्य विद्रोह प्रमुख वजह थी। देउबा चुनाव चाहते थे, जो नहीं हुए। नतीजा, तत्कालीन राजा ज्ञानेंद्र शाह ने देउबा को अयोग्य करार देकर बर्खास्त कर दिया। शाह ने संविधान के खिलाफ जाकर सत्ता हथिया ली। इस पर विद्रोह तेज हुए और अंतत: 2006 में नेपाल से राजशाही का अंत हो गया।