Nepal: शेर बहादुर देउबा और केपी शर्मा ओली
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नेपाल में मधेसी समुदाय की एक और जीत हुई है। अब वहां की संसद ने नागरिकता अधिनियम-2006 में संशोधन करने का एक बिल पारित कर दिया है, जिससे विवाह के बाद देश की नागरिकता लेने वाले व्यक्तियों की संतान को नेपाली नागरिकता मिल सकेगी। विपक्षी दल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) के कड़े विरोध के बावजूद शेर बहादुर देउबा सरकार इस बिल को बहुमत से पारित कराने में सफल रही।
इस बिल पर राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी के दस्तखत होने के बाद ऐसे हजारों बच्चों को नेपाल की नागरिकता मिल जाएगी, जिनके माता-पिता का जन्म 12 अप्रैल 1990 के पहले हुआ था। नेपाल के संविधान के मुताबिक 12 अप्रैल 1990 से पहले नेपाल में जन्म लेने वाले विदेशी मूल के लोगों को यहां जन्म लेने के आधार पर देश की नागरिकता मिली थी। लेकिन उनके बच्चों को नागरिकता देने संबंधी कोई कानून पहले मौजूद नहीं था।
लेकिन आलोचकों का कहना है कि हाल में नागरिकता संबंधी नियमों में बदलाव के लिए उठाए गए कदमों के बावजूद लैंगिक भेदभाव संबंधी प्रावधानों को कायम रखा गया है। अब प्रावधान यह हो गया है कि नेपाली पुरुष से विवाह करने वाली विदेशी महिला नेपाल की नागरिकता लेने की प्रक्रिया अपने मूल देश की नागरिकता छोड़ने के साथ ही शुरू कर सकती है। (पहले प्रावधान था कि विवाह के सात साल बाद ही महिला नेपाली नागरिकता पाने की प्रक्रिया शुरू कर सकती है।) लेकिन यह प्रावधान नेपाली महिला से विवाह करने वाले विदेशी पुरुष पर लागू नहीं होगा।
पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की पार्टी यूएमएल अभी अपने इस रुख पर कायम है कि नेपाली पुरुष से विवाह करने वाली महिला को नागरिकता शादी के सात साल बाद ही दी जानी चाहिए। यूएमएल ने इस मामले में महिला और पुरुष के बीच भेदभाव वाला प्रावधान करने की भी आलोचना की है। पार्टी की सांसद विमला राय पौडयाल ने संसद में कहा- ‘संविधान के तहत पुरुष और महिला की बराबरी तय की गई है। इसलिए यह बिल संविधान के खिलाफ है।’
समझा जाता है कि देउबा सरकार ने नागरिकता नियमों में बदलाव मधेसी पार्टियों के दबाव में किया है। ये पार्टियां नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा हैं। ताजा नियम लागू होने से सबसे ज्यादा लाभ मधेसी समुदाय को ही होगा। इस समुदाय के लोगों के अकसर भारतीय राज्य बिहार के लोगों के वैवाहिक संबंध बनते रहते हैं। नए विधेयक में प्रावधान है कि नागरिकता के लिए आवेदन करते समय संतानें अपने माता या पिता में से किसी का भी उपनाम चुन सकती हैं।
विधेयक में प्रावधान किया गया है कि नागरिकता प्रमाणपत्र में पिता और माता दोनों के विवरण दर्ज होंगे। अभी नागरिकता प्रमाणपत्र पर पिता, दादा या पति के विवरण ही दर्ज होते हैं। इसके अलावा नए विधेयक में उन अनाथ बच्चों को भी नागरिकता देने का प्रावधान है, जिनके माता-पिता की पहचान नहीं की जा सकी है।