फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

नेपालः ओली और दहल खेमों में अब कम्युनिस्ट पार्टी को हथियाने की होड़

Tue, 22 Dec 2020 02:59 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू

सार

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने सदन को बहाल नहीं किया, तब चुनाव की तैयारी करने का विकल्प ही बचेगा। उस हालत में दहल गुट ओली खेमे पर भारी पड़ सकता है...
विज्ञापन
Nepal PM KP Sharma Oli holds meeting with his supporters inside ruling Nepal Communist Party - फोटो : ANI
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

नेपाल में संसद भंग कराने का प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का फैसला संवैधानिक था या नहीं, इस सवाल पर अब फैसला सुप्रीम कोर्ट करेगा। दूसरी तरफ सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का व्यावहारिक रूप में विभाजन हो चुका है। संभावना है कि इस विभाजन पर मंगलवार को मुहर लग जाएगी। दोनों गुटों ने पार्टी की सेंट्रल कमेटी की अलग-अलग बैठकें बुलाई हैं। सोमवार को विभाजन की पूरी पृष्ठभूमि बन गई, जब दहल खेमे की तरफ से आयोजित पार्टी स्थायी समिति की बैठक में ओली के खिलाफ अनुशासन की कार्रवाई का प्रस्ताव रखा गया।

विज्ञापन


दूसरी तरफ ओली ने स्थायी समिति की अलग बैठक की, जिसमें विरोधी खेमों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई। पूरी संभावना है कि मंगलवार को दोनों अपने इस इरादे पर मुहर लगा देंगे। उसके बाद दोनों गुटों में पार्टी को अपने नियंत्रण में लेने की होड़ शुरू हो जाएगी।


ओली ने कहा है कि उन्हें संसद भंग कराने का फैसला इसलिए लेना पड़ा, क्योंकि विरोधी गुट उनके कामकाज में बाधा डाल रहा था। साथ ही वह उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटाने की साजिश रच रहा था। जबकि दहल खेमे ने कहा है कि ओली ने संसद को भंग कराने का असंवैधानिक फैसला लिया। दहल खेमे की बैठक में संसद के निचले सदन के 90 और ऊपरी सदन के 24 सदस्य शामिल हुए। बैठक में भंग सदन को बहाल कराने के उपायों पर विचार किया गया।
विज्ञापन


लेकिन जानकारों का कहना है कि हालांकि दहल खेमे के साथ भी काफी समर्थन है, लेकिन सदन बहाल कराने के मामले में उसके पास सीमित विकल्प ही हैं। उसके पास एकमात्र रास्ता कानूनी लड़ाई का है। लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी के सदन भंग करने के फैसले पर मुहर लगा दी, तब उसके पास इसे स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाएगा।

पार्टी के अंदर जो समीकरण हैं, उसमें ओली अकेले पड़ गए दिखते हैँ। वरिष्ठ नेता माधव कुमार नेपाल और झाला नाथ खनल दहल गुट के साथ हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने सदन को बहाल नहीं किया, तब चुनाव की तैयारी करने का विकल्प ही बचेगा। उस हालत में दहल गुट ओली खेमे पर भारी पड़ सकता है। दहल खेमे ने कहा है कि सदन बहाल कराने की उसकी कोशिश का यह मतलब नहीं है कि वह चुनाव से डरता है। लेकिन इस मुद्दे पर फैसला होना जरूरी है कि क्या ओली सरकार का यह कदम संवैधानिक है।   

यह पार्टी में हो चुके विभाजन का ही संकेत है कि दहल गुट के नेता सदन भंग करने के फैसले के खिलाफ सोमवार को हुई विपक्षी दलों की बैठक में शामिल हुए। ये बैठक नेपाली कांग्रेस और जनता समाजवादी पार्टी ने आयोजित की थी। बैठक के बाद दहल गुट के नेता नारायण काजी श्रेष्ठ ने कहा- हम “तीनों पार्टियां” प्रधानमंत्री ओली के असंवैधानिक कदम और संविधान पर उनके निरंतर हमलों के खिलाफ हैं। बैठक नेपाली कांग्रेस के दफ्तर में हुई। इसमें क्या फैसला हुआ, इस बारे में जानकारी नहीं दी गई है।

दहल खेमे ने स्थायी समिति की अपनी बैठक के बाद सोमवार को ही निर्वाचन आयोग को यह सूचना दे दी कि वह ओली के खिलाफ अनुशासन की कार्रवाई शुरू करने जा रहा है। इसी कार्रवाई पर मंगलवार को मुहर लगाई जानी है। अखबार कांतिपुर के साथ एक इंटरव्यू में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थायी समिति के सदस्य प्रदीप ग्यावली ने साफ कहा है कि पार्टी बंट चुकी है। उन्होंने कहा कि विभाजन तो 16 दिसंबर को ही हो गया था, जब पार्टी सांसदों के बहुमत ने राष्ट्रपति कार्यालय जाकर संसद का विशेष अधिवेशन बुलाने की मांग की थी।   

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी 2018 में अस्तित्व में आई थी। तब ओली के नेतृत्व वाली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) और दहल के नेतृत्व वाले माओइस्ट सेंटर ने आपस में विलय कर ये नई पार्टी बनाई थी। तब तय हुआ था कि पार्टी की समितियों में 60 फीसदी नेता ओली गुट के और 40 फीसदी दहल खेमे के होंगे। लेकिन हाल में समीकरण बदल गए। कई नेताओं ने पाला बदल लिया। पार्टी में फिलहाल राम बहादुर थापा, हरिबोल गुजारेल, मणि थापा आदि जैसे बड़े नेताओं ने यह साफ नहीं किया है कि अभी उनकी वफादारी किस गुट के साथ है। ये सभी नेता पहले दहल खेमे में थे।

नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टियों में विलय और विभाजन का इतिहास अब काफी पुराना हो चुका है। इसीलिए कई बार जनादेश मिलने के बावजूद वे कोई खास छाप देश पर नहीं छोड़ पाई हैं। इस समय कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन तब हो रहा है, जब देश में राजतंत्र की वापसी के समर्थन में आंदोलन तेज हो गया है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर मौजूदा अस्थिरता लंबी खिंची, तो उससे सबसे ज्यादा नुकसान लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष संविधान को पहुंचेगा। 

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें