मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (एमसीसी) की आर्थिक सहायता को लेकर नेपाल में जनता के स्तर पर बढ़ रहे विरोध को देखते हुए अब काठमांडू स्थित अमेरिकी दूतावास ने अब यहां सोशल मीडिया पर अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। अमेरिकी संस्था एमसीसी और नेपाल के बीच 2017 में समझौता हुआ था। इसके तहत नेपाल सरकार एमसीसी से 50 करोड़ डॉलर की आर्थिक सहायता लेने के लिए राजी हुई थी। इस मुद्दे पर नेपाल में जारी विरोध के बीच अमेरिकी दूतावास ने अपने ट्विटर और फेसबुक एकाउंट्स इस बारे में ‘भ्रम दूर करने’ की मुहिम छेड़ी है।
अमेरिकी दूतावास ने एक फेसबुक पोस्ट में लिखा है- ‘पूरे इतिहास में दुष्प्रचार और प्रोपेगैंडा के गंभीर परिणाम सामने आए हैं। सरकारों की तरफ से किए जाने वाले दुष्प्रचार से लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा पैदा होता है, युद्ध भड़कते हैं, और हिंसा फैलती है। इसकी वजह से तथ्य, विज्ञान, और विश्वसनीय पत्रकारिता को लेकर अविश्वास पैदा हुए हैं।’
इसके पहले दो अमेरिकी अधिकारियों ने यहां के अखबार काठमांडू पोस्ट को इंटरव्यू देकर इस बारे में अमेरिका का पक्ष रखा था। लेकिन उससे एमसीसी से हुए करार को लेकर अनुकूल माहौल बनाने में कोई खास मदद नहीं मिली है। यहां सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो लगातार वायरल हो रहे हैं, जिनमें कहा गया है कि अमेरिकी मदद नेपाल को अपने जाल में फंसाने की चाल है। जबकि अमेरिका का कहना है कि यह एक सिर्फ एक आर्थिक सहायता है, जो नेपाल के साथ अमेरिका के लंबे संबंधों को देखते हुए देने की पेशकश की गई है।
पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि ये बात नेपाली जनता को समझाने के लिए अमेरिका कड़ी मेहनत कर रहा है। हाल ही में काठमांडू स्थित नेपाली दूतावास ने नेपाल के मीडिया विशेषज्ञों की एक बैठक बुलाई थी। अब एक अन्य पोस्ट में दूतावास ने लिखा है- अगले कुछ हफ्तों में हम इस दुष्प्रचार के बारे में चर्चा करेंगे और यह बताएंगे कि किस तरह इससे लोगों को मूर्ख बनाया जा रहा है।
एमसीसी से हुए करार को लागू करने के लिए उसका नेपाली संसद में अनुमोदन जरूरी है। लेकिन ये प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो सकी है। एमसीसी ने अब ये प्रक्रिया पूरी कराने के लिए 28 फरवरी की समयसीमा तय कर दी है। नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ये मदद लेन के समर्थक हैँ। लेकिन उनकी नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबंधन में शामिल दो कम्युनिस्ट पार्टियां इसका जोरदार विरोध कर रही हैँ।
विश्लेषकों का कहना है कि देउबा इस मुद्दे पर गहरे राजनीतिक दबाव में हैं। ये आम राय है कि अगर उन्होंने कोई जोखिम उठाया, तो उनकी सरकार गिर सकती है। इसीलिए उन्होंने अनुमोदन प्रस्ताव संसद में लाने का एलान करने के बाद उससे कदम पीछे खींच लिया। इस मामले में सहमति बनाने के लिए गुरुवार और शुक्रवार को सत्ताधारी गठबंधन में शामिल पांचों दलों के नेताओं की बैठक हुई। लेकिन उनमें कोई सहमति नहीं बनी। अब अगली ऐसी बैठक रविवार को बुलाई गई है।
इस बीच अनुमोदन प्रस्ताव पर समर्थन जुटाने के लिए देउबा पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली से भी लगातार संपर्क में हैँ। लेकिन जानकारों का कहना है कि अगर ओली के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) के समर्थन से प्रस्ताव पारित कराया गया, तो सत्ताधारी गठबंधन का बिखरना तय हो जाएगा।