नेपाल-तिब्बत की पहाड़ी सीमा करीब 1400 किलोमीटर लंबी है। इसका करीब 100 किलोमीटर हिस्सा इस मौसम में खास तौर पर व्यस्त रहता है। यहां कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए जाने वाले तीर्थयात्री, ट्रेकिंग करने वाले पर्यटक और कारोबारी पहुंचते हैं। बुधवार सुबह आई बाढ़ ने इसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा तबाही मचाई। इसके कारण करीब 40 किलोमीटर लंबी सीमा सड़क, एक सीमा चौकी और कई बस्तियां बह गईं तथा करीब 100 किलोमीटर तक नीचे के इलाकों में भी असर पड़ा।
इस मौसम में नेपाल के इस इलाके में इतनी भीड़ क्यों जुटती?
इस समय कैलाश मानसरोवर यात्रा के अलावा रक्षाबंधन और श्रावण पूर्णिमा जैसे त्योहार भी हैं। इन मौकों पर श्रद्धालु ऊंचाई वाले धार्मिक स्थलों और झीलों में स्नान के लिए जाते हैं। नेपाल के पूर्व वन एवं पर्यावरण मंत्री माधव प्रसाद चौलागाईं के अनुसार, इन त्योहारों के कारण इस इलाके में यात्रियों की संख्या सामान्य से ज्यादा हो सकती है। उन्होंने बताया कि कई लोग भारतीय सीमा से होकर भी इन धार्मिक स्थलों तक पहुंचते हैं।
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ट्रेकिंग के लिए अगस्त का मौसम क्यों चुना जाता?
नेपाल में मार्च से मई और सितंबर से नवंबर को ट्रेकिंग के लिए सबसे अच्छा समय माना जाता है। इसके बावजूद कई लोग अगस्त में यहां पहुंचते हैं, ताकि मुख्य पर्यटन मौसम की भीड़ से बच सकें और ट्रेकिंग के साथ धार्मिक यात्रा भी कर सकें। लांगटांग घाटी, अपर मस्टांग, स्याब्रुबेसी, तिमुरे, त्सुम घाटी और नुवाकोट का फिकुरी प्रमुख ट्रेकिंग क्षेत्रों में शामिल हैं।
कौन-कौन से धार्मिक स्थल इस इलाके को खास बनाते?
कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील के अलावा गोसाईंकुंडा, दामोदर कुंड, मुक्तिनाथ मंदिर और शे गोम्पा प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। रसुवा जिले में 4,380 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गोसाईंकुंडा हिंदुओं का महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है। मुक्तिनाथ करीब 3,800 मीटर की ऊंचाई पर है और हिंदू तथा बौद्ध दोनों समुदायों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। दामोदर कुंड भी ऊंचाई पर स्थित धार्मिक स्थल है।
बाढ़ में फंसे लोगों की संख्या का सही पता लगाना मुश्किल क्यों?
इस पूरे इलाके से गुजरने वाले यात्रियों का कोई व्यापक रिकॉर्ड नहीं है। इसी वजह से यह पता लगाना मुश्किल है कि बाढ़ के समय कितने लोग प्रभावित क्षेत्र में मौजूद थे। इसके अलावा यह इलाका पहाड़ों, नदियों और दुर्गम रास्तों से घिरा है। बाढ़ ने संपर्क मार्गों को भी नुकसान पहुंचाया है। ऐसे में बचाव और राहत कार्यों के साथ लापता लोगों की सही संख्या पता करना बड़ी चुनौती बन गया है।
इस इलाके की अर्थव्यवस्था पर्यटन पर कितनी निर्भर?
रसुवा समेत प्रभावित क्षेत्र के लिए ट्रेकिंग, तीर्थयात्रा और पर्यटन कमाई का बड़ा जरिया हैं। लांगटांग राष्ट्रीय उद्यान ट्रेकिंग, पर्वतारोहण और तामांग संस्कृति को जानने के लिए जाना जाता है। स्याब्रुबेसी लांगटांग घाटी जाने वाले ट्रेकर्स का प्रमुख प्रवेश मार्ग है, जबकि तिमुरे तिब्बत सीमा के पास व्यापारिक केंद्र है। अचानक आई बाढ़ ने ऐसे इलाकों में रहने वाले लोगों के सामने भी रोजी-रोटी और सुरक्षित रहने की बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।