हिमालय की तराई में विविधता समेटे छोटा सा देश नेपाल है। अस्थिरता से घिरा है और दुनिया के बड़े-बड़े देश निगाह गड़ाए बैठे हैं। नतीजतन घड़ी की सूई के साथ अंतरिम प्रधानमंत्री के संभावित चेहरे बदल रहे हैं। नेपाल में भारत के राजदूत रहे सूत्र का कहना है कि मुश्किल घड़ी की यही पेचीदगिंया हैं? विदेश सेवा के इस पूर्व अधिकारी का शुरू से अंदेशा है कि नेपाल का ‘जेन-जी’ आंदोलन चला नेपाल में, इसके सूत्रधार कहीं और थे। सवाल एक यह भी क्या लौटेगी राजशाही?
अमेरिका जमने की कोशिश करेगा तो चीन चुप नहीं बैठेगा?
सूत्र का कहना है कि नेपाल में हिंसा के बाद जब से शांति का प्रयास जोर पकड़ रहा है, गुत्थी सुलझने के बजाय उलझती जा रही है। विदेश मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार कहते हैं कि ऐसा होना ही था, क्योंकि नेपाल में अमेरिका, चीन समेत कई देशों का हित है। भारत का भी हित है और कोई भी देश अपने हितों की अनदेखी नहीं कर सकता। नेपाल मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरुप वर्मा बहुत बेबाक राय रखते हैं। आनंद स्वरुप वर्मा कहते हैं कि नेपाल में अमेरिका की सक्रियता साफ दिखाई दे रही है। अमेरिका जब वहां खेल कर जमने की कोशिश करेगा तो चीन इसे चुपचाप कैसे देख सकता है। नेपाल में भारत का भी हित है। लेकिन वर्मा कहते हैं कि इन सबके बावजूद नेपाल खुद को संभाल लेगा।
क्या राजशाही के दिन लौटेंगे?
आनंद स्वरुप वर्मा कहते हैं कि नेपाल की उलझती गुत्थी में राजशाही के हाथ को कैसे इनकार कर सकते हैं? वहां आंदोलन भड़का तो राजशाही समर्थक ताकतें सक्रिय हो गई। आप देखिए, कैसे नेपाल में सभी लोकतंत्र की इमारते जला दी गई? सब नष्ट कर दी गई, प्रतिष्ठान आग के हवाले कर दिए गए? नेपाल में इस साल के शुरुआत से ही इसका अंदेशा व्यक्त किया जा रहा है। प्रमोद भट्टाराई नेपाल से हैं। बताते हैं कि नेपाल नरेश ज्ञानेंन्द्र वीर बिक्रम शाह देव के पोते हृदयेन्द्र वीर बिक्रम शाह देव अमेरिका में हैं। लेकिन वह काठमांडू और नेपाल में काफी सक्रिय रहते हैं। बताते हैं राजघराने के 23-24 वर्षीय हृदयेन्द्र पारस वीर बिक्रम शाह देव के बेटे हैं। वह नेपाल में राजशाही समर्थक वर्ग से जुड़े रहते हैं। इस समर्थक वर्ग की लगातार नेपाल में राजशाही के लौटने हिन्दू राष्ट्र के रूप में नेपाल के आगे बढ़ने की मांग रहती है। बताते हैं नेपाल के अपदस्थ राजा ज्ञानेन्द्र वीर बिक्रम शाह देव ने भी लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है। राजा ज्ञानेन्द्र पिछले महीनों से थोड़ा सक्रिय भी हुए और लोगों से जुड़ने का प्रयास किया।
कौन होगा नेपाल का अंतरिम प्रधानमंत्री?
दक्षिण एशिया में श्रीलंका और बांग्लादेश में भी आंदोलन के जरिए सत्ता में बदलाव हुआ था, लेकिन दोनों देशों में अंतरिम नेतृत्व को चुनने में इतनी मशक्कत नहीं हुई थी। नेपाल में एक के बाद एक नए नाम का आना अभी जारी है और अंतरिम प्रधानमंत्री का चेहरा चुनने में कड़ी मशक्कत हो रही है। वहां सेनाध्यक्ष जनरल अशोक राज सिग्देल महत्वपूर्ण भूमिका में हैं। हिंसक प्रदर्शन के चरम पर रहने के दौरान अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में पहले काठमांडू के मेयर बालेन शाह का नाम चर्चा में आया था। इसके बाद नेपाल उच्चतम न्यायालय की महाभियोग के जरिए हटाई गई मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की का नाम चर्चा चल रहा है। कुलमन घीसिंग को भी इस पद के दावेदारों में बताया गया। माना जा रहा है कि पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के इस्तीफा देने के 75 घंटा बीतने के बाद भी एक नाम पर आपसी सहमति नहीं बन पाई है।
इतना महत्वपूर्ण क्यों है नेपाल?
800 किमी लंबा, 200 किमी चौड़ा नेपाल हिमालय की तराई का देश है। इसके उत्तर में चीन का स्वायत्तशासी प्रदेश तिब्बत है तो दक्षिण, पूर्व और पश्चिम की सीमा भारत से जुड़ी है। नेपाल दक्षिण एशिया का महत्वपूर्ण देश है। यहां अमेरिका की दिलचस्पी काफी पहले से रही है। इधर इसका एका बड़ा कारण चीन माना जा रहा है। नेपाल में पुष्प कुमार दहल‘प्रचंड’के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद से ही वहां चीन का दखल बढ़ने लगा था। इस्तीफा देने वाले प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली भी चीन के प्रबल समर्थक थे। जबकि नेपाल में 81 प्रतिशत से अधिक आबादी हिन्दुओं की है। नेपाल की तीन तरफ की सीमाएं भारत से जुड़ने के कारण भारत और नेपाल में रोटी बेटी का रिश्ता है। इतना ही नहीं राजा पृथ्वी शाह देव के जमाने से भारत और नेपाल का संबंध रहा है। त्रिभुवन देव ने भारत में नेपाल के विलय का प्रस्ताव तक दिया था। हिन्दू धर्म के बाद वहां सबसे बड़ी 9प्रतिशत की आबादी बौद्ध की है। 4.5 प्रतिशत के करीब इस्लाम, 3 प्रतिशत किरात, 1.4 प्रतिशत ईसाई समेत अन्य धर्म के लोग हैं। नेपाल के भारत एक दूसरे घर या बड़े भाई जैसा है, लेकिन चीन को भी भारत-नेपाल का यह रिश्ता खटकता है।
आगे क्या होगा...
नेपाल के हुक्मरान इसे समझते हैं कि वहां भारत के हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती। नेपाल का पड़ोसी देश चीन है और चीन इस समय अमेरिका के साथ प्रतिस्पर्धा में है। अमेरिका की निगाह में दक्षिण एशिया में एक ठोस प्रयास की है, ताकि चीन और भारत के साथ उसके रिश्ते का संतुलन बना रहे। ऐसे में नेपाल के सामने कुछ जटिल चुनौतियां हैं। पहली चुनौती वर्षों के आंदोलन और प्रयास के बाद मिली लोकतंत्र को बचाने की है। दूसरी चुनौती राजशाही की वापसी को लेकर है। समर्थक भी सक्रिय हैं। तीसरी चुनौती जनभावना का सम्मान करते हुए विदेशी ताकतों के हस्तक्षेप से नेपाल को कम प्रभावित होने देने की है। नेपाल के सामने बड़ा संकट भी है। उसके पास इस समय कोई एक सर्व मान्य नेता नहीं है। राष्ट्रपति रामचंद्र पौडवाल की जनता में अच्छी पकड़ नहीं है। अंतरिम प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल नेताओं के समर्थकों में आम राय नहीं है और पूरे नेपाल को एक सूत्र में बांधे रखने के लिए सेनाध्यक्ष जनरल अशोक राज सिग्देल ही प्रमुख हैं। ऐसे में अंदेशा यही है कि नेपाल में निर्णायक स्थिति के आने में थोड़ा समय लग सकता है।