इलिनोइस, मिशिगन और लुइसियाना में मरने वालों में 70% तक अफ्रीकी-अमेरिकी अश्वेत हैं। तेल, गैस और फार्मास्युटिकल उद्योगों ने कम आयवर्ग, अश्वेत आबादी वाले इलाकों में ही सर्वाधिक इकाइयां लगा रखी हैं। एक अनुमान के अनुसार अश्वेतों की उद्योगों के नजदीक रहने की 75 फीसदी ज्यादा संभावना है।
अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी जलवायु सहायता
रिपब्लिकन व डेमोक्रेट नेताओं ने सहायता में जलवायु और पर्यावरण पर सोचना उचित ही नहीं समझा। अमेरिका में ही कुछ राज्यों ने कोरोना को जलवायु से जोड़कर काम शुरू कर दिया है। मसलन, न्यूयॉर्क ने एक्सीलरेटेड रिन्यूएबल एनर्जी ग्रोथ एंड कम्युनिटी बैनेफिट एक्ट पारित किया है।
आर्थिक गतिविधि को मिलेगी रफ्तार
जलवायु परिवर्तन पर ध्यान देने से आर्थिक गति को रफ्तार मिलेगी। इस वक्त देशों को नवीनीकृत ऊर्जा से जुड़ी नीतियों पर फोकस करना चाहिए। अर्थव्यवस्था की गति बढ़ाने के लिए ‘ग्रीन’ रोजगारों पर जोर देना चाहिए। जलवायु और प्रकृति आधारित नीतियां ही उसके प्रकोप से बचा सकती हैं।
अधिक प्रदूषण वाले उद्योग संक्रमण फैलाने के जिम्मेदार होते हैं। अध्ययन बताते हैं कि फैक्टरियों से निकलीं मीथेन गैस से वायरस ज्यादा तेजी से रूप बदलते (म्यूटेट) हैं। श्रमिकों और आसपास रहने वाले लोगों में सांस की तकलीफें भी बढ़ती हैं। इससे उनमें फेफड़ों की खतरनाक बीमारियां पैदा हो रही हैं। यानी जो आबादी ईंधन जनित प्रदूषण का शिकार है, वह वायरस के खिलाफ भी कमजोर हो रही है।
यह है हरित अर्थव्यवस्था
पर्यावरण को खतरों और पारिस्थितिक कमियां दूर करते हुए सामाजिक समानता कायम करने को ही हरित अर्थव्यवस्था कहते हैं। सार्वजनिक व निजी निवेश में यह ध्यान रखा जाए कि कार्बन उत्सर्जन और प्रदूषण कम से कम हो, ऊर्जा और संसाधनों की प्रभावोत्पादकता बढ़े और जो जैव विविधता और पर्यावरण को नुकसान रोकने में मदद करे।