स्मृति शेष: स्टाइनम ने गांधी से प्रेरणा ले अमेरिका में छेड़ा था आंदोलन; कैसे भारत में पदयात्रा से बदली थी सोच?
Fri, 04 Sep 2026 07:31 AM IST
निर्मल कांत
कैथरीन क्यू सीली, द न्यूयॉर्क टाइम्स, न्यूयॉर्क।
सार
ग्लोरिया स्टाइनम को अमेरिका के महिला आंदोलन का बड़ा चेहरा माना जाता है, लेकिन उनकी कहानी का एक खास हिस्सा भारत से जुड़ा था। 1957 में वह गांधीजी के अनुयायियों के साथ दक्षिण भारत की पदयात्रा पर निकली थीं। आखिर भारत में ऐसा क्या देखा, जिसने उनकी सोच और आगे की पूरी जिंदगी की दिशा बदल दी?
पूरी दुनिया में चर्चित नारीवादी कार्यकर्ता ग्लोरिया स्टाइनम का बुधवार को 92 साल की उम्र में निधन हो गया। कम ही लोगों को पता होगा कि अमेरिका में महिला मुक्ति आंदोलन का प्रमुख चेहरा रही ग्लोरिया को इसकी प्रेरणा महात्मा गांधी से मिली थीं। वह 1957 में भारत आई थीं और गांधी के अनुयायियों के साथ दक्षिण भारत में पदयात्राओं का हिस्सा रही थीं।
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स्टाइनम उस समय कॉलेज के आखिरी वर्ष में थीं और अपने प्रेमी के साथ शादी करने की योजना बना रही थीं। बाद में उन्हें लगा कि वह शायद इसलिए शादी के बंधन में बंध रही हैं और बच्चा पैदा करना चाहती हैं क्योंकि समाज महिलाओं से यही अपेक्षा करता है। उन्हें विवाह एक शुरुआत नहीं, आजादी के अंत जैसा लगा। बस फिर क्या था, उन्होंने सगाई की अंगूठी अपने मंगेतर के तकिये के नीचे रख दी और भारत के सफर पर रवाना हो गईं।
पदयात्रा कर जमीनी हकीकत जानी
वह स्वतंत्रता के केवल एक दशक बाद महात्मा गांधी की विरासत से आकर्षित होकर भारत की ओर खिंची चली आई थीं। उन्होंने अध्ययन के लिए चेस्टर बोउल्स एशियाई फेलोशिप जीती थी लेकिन जल्द ही अपनी कक्षाएं छोड़ दीं। एक साड़ी पहनकर और केवल एक तौलिया, एक कप और एक कंघी लेकर गांधीजी के अनुयायियों के साथ दक्षिणी भारत में पदयात्रा पर निकल पड़ीं। यहीं, उन्होंने जमीनी स्तर पर संगठन के बारे में सबक सीखे और आगे चलकर अमेरिका में महिला मुक्ति आंदोलन शुरू किया।
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प्लेबॉय क्लब में काम कर महिलाओं की दुर्दशा जानी
अमेरिका लौटने के बाद ग्लोरिया ने मैसाचुसेट्स में एक एनजीओ के लिए काम किया। बतौर पत्रकार भी सक्रिय रहीं। वर्ष 1963 में न्यूयॉर्क के प्लेबॉय क्लब में एक अंडरकवर वेट्रेस के रूप में काम किया ताकि महिलाओं की स्थिति को करीब से जान सकें।
रिपोर्ट ने मचा दिया तहलका...
उन्होंने करीब दो हफ्ते तक क्लब में यह काम शो पत्रिका के लिए किया। इसके बाद उनकी जो रिपोर्ट छपी उसने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया। उस दौर में जब महिलाओं को गंभीर पत्रकार या पेशेवर नहीं बल्कि केवल खूबसूरत शो-पीस माना जाता था, ग्लोरिया ने उस कड़वी सच्चाई को दुनिया के सामने रखा, जिसे समाज हमेशा दबाए रहता था।
25 मार्च 1934 को टोलेडो, ओहायो में जन्म। 10 वर्ष की आयु में माता-पिता के तलाक के बाद मानसिक रूप से अस्वस्थ मां की देखभाल की जिम्मेदारी संभाली।
1968 में न्यूयॉर्क पत्रिका की सह-संस्थापक बनीं और मासिक राजनीतिक कॉलम द सिटी पॉलिटिक शुरू कर बेबाक राय रखनी शुरू की।
1972 में पूरी तरह महिलाओं के स्वामित्व वाली और संचालित पहली राष्ट्रीय पत्रिका मिस की सह-स्थापना की, जिसने गर्भपात, घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया।
90 वर्ष की उम्र तक निबंध लिखने, व्याख्यान देने में सक्रिय रही और महिलाओं के मुद्दे उठाती रहीं।