अमेरिकन इंटरप्राइज इंस्टीट्यूट में रेसीडेंट स्कॉलर रुबिन ने लिखा है, अमेरिका की सबसे लंबी लड़ाई खत्म करने के उत्साह में ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान की भूमिका भूल रहा है। अमेरिका को ऐसी रणनीतिक गलती नहीं करनी चाहिए।
न ही उसे फाइनेंशियल टास्क फोर्स में ब्लैकलिस्ट किए जाने के दुष्परिणामों से बचाना चाहिए, क्योंकि पाकिस्तान अपनी सीमा में आतंकियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रहा। ट्रंप अफगानिस्तान में अपनी जीत की घोषणा करने की जल्दबाजी में हैं, लेकिन पाकिस्तान अब भी चुनौती बना है।
अमेरिका द्वारा तालिबान को पैदा करने से इनकार
अफगानिस्तान में प्रभाव बनाए रखने के लिए पाकिस्तान पर तालिबान के समर्थन के आरोप पुराने हैं। रुबिन ने इस तर्क को खारिज किया है कि अमेरिका ने अफगानिस्तान पर रूस के हमले से मुकाबले के लिए तालिबान को पैदा किया।
उन्होंने लिखा, रूसी आक्रमण के दौरान अमेरिका अफगान मुजाहिदीनों के साथ था, जो नॉर्दर्न अलायंस और मौजूदा अफगान सरकार के पूर्ववर्ती थे। तालिबान 1994 में पैदा हुआ।
रुबिन ने लिखा, जब रूस अफगानिस्तान से चला गया, तब पाकिस्तानी अधिकारी गुलबदीन हिकमतयार के साथ गोलबंद हुए, लेकिन तालिबान मजबूत होने लगा तो उसका समर्थन करने लगा। 9-11 के बाद अमेरिका ने तालिबान के खिलाफ कार्रवाई शुरू की, तब भी पाकिस्तान तालिबान को हथियार और पैसे उपलब्ध कराता रहा।
पाकिस्तान अफगानिस्तान में स्थायी सरकार नहीं चाहता था। पाकिस्तान ने अल-कायदा की भी मदद की और इसके संस्थापक ओसामा बिन लादेन को सुरक्षा उपलब्ध कराई। रुबिन ने लिखा कि ट्रंप एक सप्ताह के युद्ध विराम को अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान छोड़ने के लिए अच्छा संकेत मान सकते हैं, लेकिन उन्होंने पाकिस्तान के इरादों को समझने की कोई कोशिश नहीं की है।
पुलवामा हमले की भी चर्चा
रुबिन ने भारत के पुलवामा हमले की चर्चा करते हुए लिखा है कि इस हमले और बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ा तो पाकिस्तान ने अपनी सीमा में आतंकी संगठनों पर नकेल कसने का भरोसा दिलाया। एक साल बीत जाने के बाद लश्कर-ए-ताइबा जैसे संगठनों के खिलाफ कार्रवाई तो दूर की बात है, पाकिस्तान उनके लिए संयुक्त राष्ट्र से सहूलियतों की पैरवी कर रहा है।