पर्यावरण की चुनौती
तमाम वैज्ञानिक और पर्यायवरणविद आर्कटिक में बर्फ के लगातार पिघलने को लेकर चेतावनी देते रहे हैं। इस कारण न केवल वहां रहने वाले पोलर बियर और समुद्री जीवों पर खतरा मंडरा रहा है, बल्कि इससे समुद्र का जलस्तर भी बढ़ रहा है और समुद्रतटीय इलाकों के पानी में डूबने संभावनाएं भी बढ़ रही हैं।
इसके साथ ही वो इस बात पर भी चेतावनी देते रहे हैं कि अगर आर्कटिक के रास्ते अधिक यातायात होगा तो इस इलाके में प्रदूषण बढ़ जाएगा जो आर्कटिक में रहने वाले जीवों के लिए नुकसानदायक साबित होगा। आर्किटक काउंसिल में अमेरिका, कनाडा, रूस, फिनलैंड, नॉर्वे, डेनमार्क, स्वीडन और आइसलैंड शामिल हैं। ये तमाम देश हर दूसरे साल में एक सम्मेलन कर आर्कटिक से जुड़ी आर्थिक और पर्यायवरण संबंधी चुनौतियों पर चर्चा करते हैं।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि अमेरिका ने इस सम्मेलन के संयुक्त बयान को इसलिए रोक दिया गया क्योंकि इसमें जलवायु परिवर्तन की वजह से आर्कटिक को बहुत अधिक नुकसान पहुंचने के बारे में बताया जाना था। साल 2017 में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका को अलग कर दिया था, इस समझौते में कुल 200 देश शामिल थे। आर्कटिक सम्मेलन में पोम्पियों ने चीन और रूस पर कड़ा रुख अपनाते हुए आरोप लगाया कि ये दोनों देश आर्कटिक क्षेत्र में लगातार घुसपैठ कर रहे हैं।