नेपाल में स्थानीय चुनाव की तारीख का औपचारिक एलान होने के बाद अब सत्ताधारी गठबंधन के भविष्य पर सबका ध्यान टिक गया है। राजनीतिक हलकों में अब सबसे चर्चित सवाल यही है कि क्या नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबंधन में शामिल पांचों दल एकजुट रहते हुए चुनाव में उतरेंगे, या चुनाव के पहले ही गठबंधन बिखर जाएगा। ताजा एलान के मुताबिक स्थानीय चुनाव एक चरण में 13 मई को कराए जाएंगे।
28 फरवरी तक संसदीय अनुमोदन जरूरी
सत्ताधारी गठबंधन के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती अमेरिकी संस्था मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (एमसीसी) की मदद स्वीकार करने या ना करने के बारे में फैसला लेने की है। मदद लेने के लिए इस बारे में पांच साल पहले हुए करार का अनुमोदन संसद में कराना होगा। एमसीसी ने शर्त रख दी है कि अगर नेपाल को 50 करोड़ डॉलर की ये मदद चाहिए, तो उसे 28 फरवरी तक संसदीय अनुमोदन की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
स्थानीय चुनाव के कार्यक्रम का एलान सोमवार को हुआ। उसके पहले रविवार को प्रधानमंत्री और नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा की विपक्षी नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) के नेता केपी शर्मा ओली से मुलाकात हुई थी। इस मौके पर सत्ताधारी गठबंधन में शामिल नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओइस्ट सेंटर) के अध्यक्ष पुष्प कमल दहल भी मौजूद थे। उस बैठक में क्या चर्चा हुई, इस बारे में तीनों पार्टियों ने अब तक चुप्पी साध रखी है। लेकिन सूत्रों ने मीडिया को बताया है कि बैठक में एमसीसी की मदद के मसले पर भी बातचीत हुई।
इस बीच माओइस्ट सेंटर के नेता देव गुरंग ने कहा है कि स्थानीय चुनावों के कार्यक्रम का एलान स्वागतयोग्य घटना है। उन्होंने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘लेकिन बेहतर यह होता कि चुनाव कार्यक्रम का एलान संवैधानिक प्रावधानों और चुनाव अधिनियमों के बारे में जारी भ्रम को दूर करने के बाद होता।’ माओइस्ट सेंटर और सत्ताधारी गठबंधन में शामिल एक अन्य दल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूनिफाइड सोशलिस्ट) ने स्थानीय चुनावों को टालने की मांग की थी। ये दोनों पार्टियां एमसीसी की मदद स्वीकार करने का भी विरोध कर रही हैं।
गठबंधन टूटने की आशंका
पर्यवेक्षकों के मुताबिक अब जबकि चुनाव कार्यक्रम की घोषणा हो गई है, देखने की सबसे अहम बात यही है कि सत्ताधारी गठबंधन किस दिशा में जाता है। तमाम संकेत हैं कि देउबा एससीसी की मदद लेने पर अडिग हैं। इस सिलसिले में उन्होंने विपक्षी यूएमएल पार्टी का समर्थन पाने की कोशिश भी की है। लेकिन अगर देउबा ने ऐसा किया, तो सत्ताधारी गठबंधन के बिखरने की आशंका मजबूत हो जाएगी। जानकारों की राय है कि अब चूंकि एमसीसी ने मदद स्वीकार करने की समयसीमा तय कर दी है, इसलिए देउबा सरकार को इस बारे में जल्द से जल्द फैसला लेना होगा।
माओइस्ट सेंटर पार्टी में दहल के करीबी समझे जाने वाले एक नेता ने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा है कि अगर अमेरिकी मदद स्वीकार की गई, तो उस हाल में उनकी पार्टी सत्ताधारी गठबंधन से हटना पसंद करेगी। बताया जाता है कि सहयोगी दलों के ऐसे रुख से देउबा गहरे दबाव में हैं। वे मदद लेना चाहते हैं, लेकिन ऐसा गठबंधन को खतरे में डालने की कीमत पर ऐसा नहीं करना चाहते। लेकिन पर्यवेक्षकों के मुताबिक उनके पास ज्यादा समय नहीं है। उन्हें आर या पार का फैसला अगले कुछ दिनों के अंदर ही लेना होगा।