नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली पर अब इल्जाम लग रहे हैं कि उन्होंने उन ताकतों के लिए जमीन तैयार की है, जो देश के गणतांत्रिक, संघीय और धर्मनिरपेक्ष ढांचे को चुनौती दे रहे हैं। ओली ने रविवार को अचानक देश की संसद को भंग करने की सिफारिश कर दी, जिसे तुरंत राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने स्वीकार कर लिया। इससे नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर ओली के प्रतिद्वंदी और राजनीतिक पर्यवेक्षक सब भौंचक रह गए।
दूसरे जानकारों ने भी कहा है कि प्रधानमंत्री ओली ने जनता से निर्वाचित संसद का गला घोंट दिया है। उनके इस कदम को ‘संवैधानिक तख्ता पलट’ भी बताया गया है। ऐसा ओली ने संभवतः इसलिए किया क्योंकि पार्टी के अंदर उनका आधार तेजी से सिकुड़ रहा था। इस कारण उनके हाथ से प्रधानमंत्री पद निकलने की संभावना बन रही थी। 90 सांसदों ने उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया था। हाल में विपक्षी नेपाली कांग्रेस पार्टी ने भी उन पर दबाव बढ़ा दिया था। ओली ने जिस तरह संवैधानिक परिषद अध्यादेश को जारी कराया, उससे नेपाली कांग्रेस भी खफा हो गई है।
नेपाल की संसद का चुनाव पांच साल के लिए हुआ था। लेकिन अब तीन साल पर ही नए चुनाव होंगे। सरकारी घोषणा के मुताबिक अप्रैल में मतदान होगा। लेकिन कई समूह संसद भंग करने के राष्ट्रपति के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने पर विचार कर रहे हैं। उनका कहना है कि राष्ट्रपति ने संसद को भंग कर असंवैधानिक काम किया है। यहां के वरिष्ठ वकील चंद्रकांत गयाली ने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा कि राष्ट्रपति भंडारी संविधान की अभिभावक की अपनी भूमिका निभाने में पूरी तरह नाकाम रही हैं। इसी अखबार से संवैधानिक अधिनियमों के विशेषज्ञ भीमार्जुन आचार्य ने कहा कि ओली सरकार और राष्ट्रपति दोनों के कदम संवैधानिक तखता पलट की श्रेणी में आते हैं। दोनों ने संवैधानिक प्रावधानों की गलत व्याख्या की है।