श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट ने संसद को बर्खास्त करने के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना के फैसले को पलट दिया है और नए सिरे से चुनाव की तैयारियों पर रोक लगाने का आदेश दिया है। एएफपी के मुताबिक, प्रधान न्यायाधीश नलिन परेरा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने जब ये फैसला सुनाया, कोर्ट खचाखच भरा था जिसके बाहर सैकड़ों हथियारबंद पुलिस कमांडो तैनात थे।
श्रीलंका के सियासी संकट में ये नवीनतम नाटकीय घटनाक्रम है जहां समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति के फैसले पर सात दिसंबर तक रोक रहेगी। उठापटक की शुरुआत 26 अक्तूबर से हुई थी जब राष्ट्रपति सिरीसेना ने प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री के पद से हटाकर महिंदा राजपक्षे को देश का नया प्रधानमंत्री घोषित कर दिया था।
राष्ट्रपति सिरीसेना ने पिछले हफ्ते संसद को तब भंग कर दिया था, जब कुछ खबरों में ये कहा जा रहा था कि उनके नामित प्रधानमंत्री राजपक्षे के पास संसद में बहुमत साबित करने के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं है। महिंदा राजपक्षे श्रीलंका की राजनीति में पुराने और मजबूत खिलाड़ी हैं।
पृथकतावादी लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) की उखड़ती जड़ों के साथ राजपक्षे ने अपनी जड़ों को मजबूत बनाया और वो साल 2005 से साल 2015 तक श्रीलंका के राष्ट्रपति रहे। साल 2015 में राजपक्षे को सिरीसेना ने राष्ट्रपति के चुनाव में हराया था। सिरीसेना राष्ट्रपति बने थे और उन्होंने रानिल विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री बनाया था।
लेकिन बीते तीन वर्षों में सिरीसेना और विक्रमसिंघे का तालमेल गड़बड़ाया जिसके बाद राजपक्षे उभरकर सामने आए हैं, लेकिन अभी उन्हें संसद में समर्थन साबित करना बाकी है।
श्रीलंका के मौजूदा सियासी घटनाक्रम पर भारत और चीन दोनों की पैनी नजर है। भारत की तमिल राजनीति के हिसाब से श्रीलंका काफी महत्वपूर्ण है, दूसरी तरफ चीन ने श्रीलंका में बड़े पैमाने पर निवेश किया है।