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जन आंदोलन को बताया जन विद्रोह: कजाखस्तान की अशांति से रूस को मिला फिर वर्चस्व जमाने का मौका?

Sat, 08 Jan 2022 01:43 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, नूर सुल्तान

सार

रूस ने औपचारिक रूप से यही कहा है कि कजाखस्तान की घटनाओं से उसका कोई संबंध नहीं है। क्रेमलिन ने एक बयान में कहा कि कजाखस्तान ‘अपने घरेलू मसले को स्वतंत्र रूप से हल करने में सक्षम है’। लेकिन इसी बीच रूसी सेना कजाखस्तान पहुंच चुकी है। सीएसटीओ में रूस के अलावा पांच पूर्व सोवियत गणराज्य शामिल हैं...
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कजाखस्तान में अशांति - फोटो : Agency
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विस्तार
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कजाखस्तान में उथल-पुथल रूस के लिए इस देश पर फिर से अपना वर्चस्व कायम करने का मौका बन सकती है। ये आशंका पश्चिमी विशेषज्ञों ने जताई है। कजाखस्तान में गैस की कीमत को लेकर शुरू हुए जन आंदोलन ने गुरुवार को हिंसक रूप ले लिया। इसके पहले राष्ट्रपति कासिम-जोमार्त तोकायेव की सरकार ने रूस के नेतृत्व वाले कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीटी ऑर्गेनाईजेशन (सीएसटीओ) से अपनी शांति सेना भेजने की अपील की थी। उस पर तुरंत अमल करते हुए शांति सेना के दस्ते यहां पहुंच गए। उनमें सबसे ज्यादा सैनिक रूस के ही हैं।

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जर्मनी की ब्रेमेन यूनिवर्सिटी में मध्य एशिया क्षेत्र के विशेषज्ञ निकोलाय मित्रोखिन ने टीवी चैनल अल-जजीरा से कहा- ‘कुछ लोगों की नजर में यह जन विद्रोह है। लेकिन कुछ लोगों की राय में यह यूएसएसआर (यूनियन ऑफ सोशलिस्ट सोवियत रिपब्लिक) को फिर से कायम करने का मौका है। ये मौका भयभीत तानाशाह दे रहे हैं, जो अपने देश के हितों से विश्वासघात करते हैं और फिर खुद को बचाने की कोशिश में रहते हैं।’

रूसी सेना पहुंची कजाखस्तान

रूस ने औपचारिक रूप से यही कहा है कि कजाखस्तान की घटनाओं से उसका कोई संबंध नहीं है। क्रेमलिन (रूसी राष्ट्रपति का कार्यालय) ने एक बयान में कहा कि कजाखस्तान ‘अपने घरेलू मसले को स्वतंत्र रूप से हल करने में सक्षम है’। लेकिन इसी बीच रूसी सेना कजाखस्तान पहुंच चुकी है। सीएसटीओ में रूस के अलावा पांच पूर्व सोवियत गणराज्य शामिल हैं। सीएसटीओ की सेना कजाखस्तान भेजने का एलान अर्मीनिया के राष्ट्रपति निकोल पेशिनयन ने बुधवार को किया था।

कजाखस्तान के अधिकारियों ने यहां हुई हिंसा के लिए ‘उग्रवादियों’ को दोषी ठहराया है। लेकिन मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक जन प्रदर्शनों में ज्यादातर नौजवान लोग थे। ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि प्रदर्शनकरियों का कोई अपना संगठन है। विपक्षी दलों ने जरूर प्रदर्शनों का समर्थन किया है। मित्रोखिन ने कहा- ‘कोई साझा सांगठनिक ढांचा नहीं है। उनका कोई नेता भी नहीं है। प्रदर्शनों में मुख्य उद्योगों के कर्मचारी, और संभवतः छोटे कारोबारी भी शामिल हुए हैं।’

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विशेषज्ञों का कहना है कि कजाखस्तान में इसके पहले जो विरोध प्रदर्शन हुए थे, मौजूदा प्रदर्शन उससे बिल्कुल अलग हैं। ब्रिटेन की एक्सटर यूनिर्सिटी में लेक्चरर कोवोर्क ओस्कनियन ने अल-जजीरा से कहा- ‘ये अशांति बिल्कुल अलग तरह की है। इसमें पूरा देश शामिल है।’

गहरी हैं कम्युनिस्ट पार्टी की जड़ें

मध्य एशिया में स्थित पांच में से चार पूर्व सोवियत गणराज्य मुस्लिम बहुल देश हैं। इन पांचों गणराज्यों की कुल आबादी साढ़े छह करोड़ है। इन देशों पर अब तक कुल मिलाकर उन्हीं नेताओं का शासन है, जो सोवियत जमाने में कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थे। मसलन, कजाखस्तान के पड़ोसी देश किर्गिजस्तान के राष्ट्रपति 53 वर्षीय राष्ट्रपति सादिर जापारोव यंग कम्युनिस्ट लीग के सदस्य थे।

मध्य एशियाई गणराज्यों के नेताओं का दावा है कि उनकी सेकुलर नीति के कारण इस्लामी कट्टरपंथी उनका विरोध करने का मौका ढूंढते रहते हैं। जानकारों का कहना है कि इसी तर्क पर उन्होंने अपने खिलाफ तमाम विरोध प्रदर्शनों का दमन किया है। लेकिन कजाखस्तान में जिस पैमाने पर विरोध भड़का है, उसके बीच ये तर्क निराधार हो गया है। ऐसे में तोकायेव की रूस पर निर्भरता बढ़ गई है।

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