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काबुल हमला: अफगान शांति समझौते के उड़े परखच्चे, पूरे देश में शोक दिवस

Tue, 03 Nov 2020 04:40 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल

सार

  • सोमवार को अमेरिकी दूत ने की थी पाकिस्तानी सेना प्रमुख बाजवा से बात
  • अमेरिका लगातार करता रहा है अफगानिस्तान में शांति के लिए पाकिस्तान की तारीफ
  • शांति समझौते में तालिबान को शामिल कराने में पाक भूमिका को लेकर उठे सवाल
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Attack on kabul university - फोटो : Tolo News
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विस्तार
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मंगलवार को अफगानिस्तान सरकार की अपील पर सारे देश में शोक दिवस मनाया गया। सोमवार को काबुल विश्वविद्यालय में हुए घातक हमले का शिकार बने छात्रों और अन्य लोगों को इस दौरान श्रद्धांजलि दी गई। मगर इस घटना ने ये साफ कर दिया है कि किस तरह अफगानिस्तान में शांति कायम करना अभी भी दूर की कौड़ी है।   

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गौरतलब है कि जिस रोज अमेरिका के विशेष दूत जालमे खलीलजाद अफगान शांति समझौते को कामयाब बनाने के लिए पाकिस्तान के अधिकारियों से राय-मशविरा कर रहे थे, तभी खबर आई कि दहशतगर्दों ने काबुल विश्वविद्यालय में तकरीबन 25 छात्रों की हत्या कर दी है। लगभग इतने ही छात्र इस हमले में घायल हुए।

इसके पहले आतंकवादियों ने विश्वविद्यालय में चल रहे एक पुस्तक मेले में मौजूद लोगों को बंधक बना लिया था। मेले में काबुल स्थित ईरान के राजदूत भी आने वाले थे। ऐसा समझा गया है कि दहशतगर्दों का मुख्य निशाना वही थे।
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सोमवार को ही खलीलजाद ने इस्लामाबाद में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा से बातचीत की। इसके बाद उन्होंने इस क्षेत्र में शांति कायम करने की अमेरिका की कोशिश में मददगार बनने के लिए पाकिस्तान की तारीफ की। माना जाता है कि दोहा में हुए अफगान शांति समझौते में तालिबान को शामिल कराने में पाकिस्तान की खास भूमिका रही थी।

काबुल यूनिवर्सिटी पर हुए हमले के तुरंत बाद तालिबान ने उसमें अपना हाथ होने से इंकार किया। सुरक्षा विशेषज्ञ भी इस बात से सहमत थे कि इसमें तालिबान का हाथ शामिल नहीं है। उन्होंने आतंकवादी गुट इस्लामिक स्टेट (आईएस) के बयान को गंभीरता से लिया, जिसमें इस गुट ने हमला करने की जिम्मेदारी ली है।

इसका मतलब यह है कि अब अफगानिस्तान में शांति के लिए खतरा सिर्फ तालिबान या अल-कायदा ही नहीं हैं। दोहा शांति समझौते में शामिल होते वक्त तालिबान ने हिंसक गतिविधियों से अलग होने और इसके लिए अल-कायदा को भी राजी करने का वादा किया था। लेकिन आईएस पर उसका नियंत्रण नहीं है। आईएस को अब तक अफगानिस्तान में कमजोर गुट समझा जाता था।

जानकारों के मुताबिक उसका प्रभाव खोरसान, नांगरहर और कुनार प्रांतों तक सीमित माना जाता था। लेकिन ताजा हमले के जरिए उसने संदेश दिया है कि अब वह राजधानी काबुल तक आकर भीषण हमले करने में सक्षम हो गया है।  

पिछले फरवरी में हुए दोहा समझौते के बाद से अफगान सरकार और तालिबान में चार दशकों से युद्ध ग्रस्त इस देश में शांति कायम करने के तरीकों पर बातचीत चलती रही है। लेकिन इस बीच देश के अलग-अलग हिस्सों में हिंसा भी जारी है। जबकि दोहा समझौते के समय यह समझ बनी थी कि उस करार की कामयाबी के लिए हिंसा का ठहरना जरूरी है।

मगर पिछले आठ महीने की घटनाओं से संकेत मिला है कि या तो तालिबान ने हिंसा रोकने में अपनी पूरी ताकत नहीं लगाई है, या वह ऐसा कर सकने में अक्षम है। इस बीच आईएस के ताकतवर होकर उभरने से हालत और पेचीदा हो गई लगती है।

दोहा समझौता अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज वापसी की योजना का परिणाम था। उसके मुताबिक अमेरिका और नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) के सभी फौजी अगले साल के पहले छह महीनों में वापस चले जाने लगे हैं। मगर अब जो हालत नजर आ रहे हैं, उसमें क्या ऐसा हो पाएगा, ये सवाल अहम हो गया है।
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