इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री सुगा की लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी में भी मतभेद देखा गया। पार्टी अपने कंजरवेटिव और प्रगतिशील सदस्यों के बीच बंटी नजर आई। एलडीपी की नेता और लैंगिक समानता विभाग की मंत्री सीको हाशिमोतो अलग-अलग सरनेम का विकल्प देने का जोरदार समर्थन कर रही हैं। लेकिन पार्टी के कई नेता इसके बिल्कुल खिलाफ हैं।
गौरतलब है कि महिलाओं से भेदभाव खत्म करने के लिए बनी संयुक्त राष्ट्र की समिति ने दुनिया भर की सरकारों से विवाह के बाद महिलाओं को अपना पैतृक सरनेम रखने का विकल्प देने की मांग की हुई हैैै, लेकिन जापान में हाल के सर्वेक्षणों से जाहिर हुआ कि वहां के ज्यादातर लोग एक सरनेम की परंपरा कायम रखने के पक्ष में हैं।
जापान में प्रबंधकीय पदों पर आज भी महिलाओं की मौजूदगी सिर्फ 14.8 प्रतिशत है। अब सरकार की नई नीति में 2025 तक इसे 30 फीसदी तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही यह लक्ष्य भी रखा गया है कि 2025 तक देश की संसद और स्थानीय निकायों में महिलाओं की नुमाइंदगी 35 प्रतिशत हो।
टोक्यो स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड कंपनियों में कार्यकारी अधिकारियों के पदों पर 2022 तक 20 फीसदी महिलाओं को पहुंचाने का लक्ष्य भी सरकार ने घोषित किया है। नई नीति में सरकार ने महिलाओं को बिना प्रिसक्रिप्शन के आपातकालीन गर्भनिरोधक गोलियों को खरीदने की सुविधा देने की अपनी मंशा भी जताई है।
साल 2019 में वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम की तरफ से जारी लैंगिक भेदभाव रैंकिंग में विकसित देशों के बीच जापान सबसे निचले पायदान पर आया था। 153 देशों की इस सूची में उसका स्थान 121वां था, लेकिन सामाजिक पिछड़ेपन की इस सूरत से जापान के राजनेता ज्यादा परेशान नहीं हैं। उन्होंने फिलहाल अपनी रूढ़िवादी परंपरा को जारी रखने का फैसला किया है।