इस्राइल ने शुक्रवार को सोमालीलैंड को एक स्वतंत्र देश के रूप में आधिकारिक मान्यता दे दी। ऐसा करने वाला इस्राइल पहला देश बन गया है। इस अवसर पर इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सोमालीलैंड के राष्ट्रपति डॉ. अब्दिरहमान मोहम्मद अब्दुल्लाही को बधाई दी। उन्होंने राष्ट्रपति के नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि वे क्षेत्र में स्थिरता और शांति को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। नेतन्याहू ने इसे दोनों देशों के रिश्तों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
बता दें कि सोमालीलैंड ने करीब 30 साल पहले सोमालिया से अलग होने का एलान किया था। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि आखिर सोमालीलैंड क्या है, कब बना और ये इस्राइल के लिए महत्वपूर्ण कैसे है? आइए जानते हैं।
इस्राइल के लिए इसकी महत्वपूर्णता समझने के लिए पहले ये समझते है कि आखिर सोमालीलैंड क्या है? सोमालीलैंड अफ्रीका के हॉर्न ऑफ अफ्रीका इलाके में स्थित है। यह लाल सागर के पास है, जो व्यापार और सुरक्षा के लिहाज से बहुत अहम समुद्री रास्ता है। सोमालीलैंड को 1960 में कुछ समय के लिए आजादी मिली थी। उसी साल सोमालीलैंड अपनी मर्जी से सोमालिया के साथ जुड़ गया था।
सोमालिया से क्यों अलग हुआ?
सोमालिया से अलग होने के कारण को ऐसे समझा जा सकता है कि जब 1991 में सोमालिया चारों ओर से गृहयुद्ध से घिर गया, सोमालीलैंड ने फिर से खुद को अलग देश घोषित कर दिया। तब से सोमालीलैंड का अपना राष्ट्रपति, सरकार, मुद्रा और सुरक्षा बल हैं। यहां अपेक्षाकृत शांति और लोकतांत्रिक व्यवस्था रही है, जबकि सोमालिया लंबे समय से अस्थिरता झेल रहा है।
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अब समझिए इस्राइल ने क्या फैसला लिया?
इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और विदेश मंत्री गिडियोन साआर ने सोमालीलैंड को मान्यता देने वाले दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए। सोमालीलैंड की ओर से राष्ट्रपति अबदिरहमान मोहम्मद अब्दुल्लाही ने इसे मंजूरी दी। नेतन्याहू ने फोन पर बात करते हुए इसे ऐतिहासिक पल बताया और कहा कि दोनों देशों के रिश्ते नए आर्थिक मौके खोलेंगे।स
आगे किस सहयोग है कि संभावना?
ऐसे में अब जब इस्राइल ने सोमालीलैंड को देश मान लिया है। तब दोनों देशों के बीच अब किस प्रकार के सहयोग को बढ़ावा दिया जाएगा। ये भी एक बड़ा सवाल है। इस बात के जवाब में इस्राइली पीएम नेतन्याहू ने बताया कि इस्राइल और सोमालीलैंड मिलकर आर्थिक विकास, कृषि सामाजिक विकास जैसे क्षेत्रों में साथ काम करेंगे। उन्होंने सोमालीलैंड के राष्ट्रपति को इस्राइल आने का न्योता भी दिया, जिसे राष्ट्रपति अब्दुल्लाही ने जल्द स्वीकार करने की बात कही।
यह मान्यता क्यों अहम है?
अब बात अगर इस्लाइल के फैसले और अहमियत की करें तो यह फैसला इस्राइल की क्षेत्रीय कूटनीति का हिस्सा माना जा है। नेतन्याहू ने कहा कि यह कदम अब्राहम समझौते की भावना के अनुरूप है, जिसे 2020 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पहल पर किया गया था। अब्राहम समझौते के तहत इस्राइल ने यूएई, बहरीन और बाद में मोरक्को जैसे देशों से रिश्ते बनाए थे। सोमालीलैंड भी भविष्य में अब्राहम समझौते के ढांचे में शामिल होने की इच्छा जता चुका है।
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बाकी देशों का क्या रुख है?
गौरतलब है कि अब तक किसी और देश ने सोमालीलैंड को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन ब्रिटेन, इथियोपिया, तुर्किय, यूएई, डेनमार्क, केन्या, ताइवान जैसे देशों के साथ उसके अनौपचारिक रिश्ते हैं।ऐसे में इस्राइल की यह मान्यता सोमालीलैंड के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है। इससे सोमालीलैंड को वैश्विक पहचान मिलने की उम्मीद बढ़ी है और अफ्रीका व मध्य-पूर्व की राजनीति में नए समीकरण भी बन सकते हैं।
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