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ISIS attacks on Chinese: अफगानिस्तान के जिहादी गुटों के निशाने पर क्यों आ गया है चीन?

Mon, 19 Dec 2022 05:24 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल

सार

ISIS attacks on Chinese: द खोरासान डायरी के सह-संस्थापक वेले रिकार्डो ने कहा है- ‘आईएसआईएस-के की कोशिश यह है कि तालिबान का एक विद्रोही गुट से व्यवस्थित सरकार के रूप में रूपांतरण ना हो सके। इस वजह से वह ऐसे हमले कर रहा है, जिससे पड़ोसी देशों से तालिबान के रिश्ते प्रभावित हों।’
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ISIS attacks on Chinese - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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अफगानिस्तान में बिगड़ती स्थिति चीन (ISIS attacks on Chinese) के लिए बड़ी चिंता का कारण बन गई है। पिछले हफ्ते काबुल में उस होटल पर हमला हुआ, जहां आम तौर पर चीनी व्यापारी ठहरते हैं। हाल में अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकवादी गुटों ने चीनी ठिकानों को निशाने पर लेना शुरू किया है। इनमें आईएसआईएस (खुरासान) खास है, जिसने 12 दिसंबर को होटल हुए हमले की जिम्मेदारी ली। उसने एक बयान में कहा- ‘चीनी कम्युनिस्ट और तालिबान हमारा निशाना हैं।’

पर्यवेक्षकों के मुताबिक अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद किसी चीनी ठिकाने पर यह पहला बड़ा हमला था। हमले के अगले दिन चीन के विदेश मंत्रालय ने बताया कि पांच चीनी नागरिक घायल हुए हैं। मंत्रालय ने चीनी नागरिकों को सलाह दी कि वे तुरंत अफगानिस्तान से बाहर निकल जाएं।

इस हमले के कुछ ही दिन पहले काबुल स्थित चीनी राजदूत वांग यू अफगानिस्तान के उप विदेश मंत्री शेर मोहम्मद अब्बास स्तानिकजई से मिले थे। दोनों के बीच काबुल स्थित चीनी दूतावास की सुरक्षा और चौकस करने पर बातचीत हुई थी। हाल में आईएसआईएस-के ने काबुल स्थित पाकिस्तानी और रूसी दूतावासों पर भी हमले किए हैं।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी नागरिकों पर हमला आईएसआईएस-के की तालिबान को अस्थिर करने की रणनीति का हिस्सा है। आतंकवादी गुटों पर नजर रखने वाली वेबसाइट द खोरासान डायरी के सह-संस्थापक वेले रिकार्डो ने कहा है- ‘आईएसआईएस-के की कोशिश यह है कि तालिबान का एक विद्रोही गुट से व्यवस्थित सरकार के रूप में रूपांतरण ना हो सके। इस वजह से वह ऐसे हमले कर रहा है, जिससे पड़ोसी देशों से तालिबान के रिश्ते प्रभावित हों।’

विशेषज्ञों के मुताबिक यह ठीक वैसी ही रणनीति है, जैसी पाकिस्तान में बलूच अलगाववादियों ने अपना रखी है। वे पाकिस्तान और चीन के रिश्तों में दरार डालना चाहते हैं। इधर जब से तालिबान सत्ता में आए हैं, चीन ने उनके साथ कूटनीतिक संबंध बढ़ा रखे हैं। चीन तालिबान शासन को आर्थिक और विकास संबंधी सहायता देने की पेशकश कर रहा है।

इस वर्ष अप्रैल में उसने तालिबान को बीजिंग में अपना दूतावास खोलने की इजाजत दे दी। जुलाई में ताशकंद में अफगानिस्तान के बारे में हुए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में चीनी प्रतिनिधि ने एलान किया कि चीन पूरे अफगानिस्तान में रेल लाइन बिछाने और उज्बेकिस्तान के साथ उसका रेल संपर्क बनाने के लिए वित्तीय सहायता देगा। इसलिए अब तालिबान विरोधी गुटों ने ऐसी गतिविधियां शुरू कर दी हैं, जिससे चीन और काबुल सरकार के बीच सहयोग को रोका जा सके।

रिकार्डो ने कहा- ‘आईएसआईएस-के चीन को तालिबान के मालिकों में से एक मानता है। आईएसआईएस-के ने इस वर्ष प्रकाशित अपनी एक किताब में चीन को तालिबान का दोस्त बता कर उनकी आलोचना की है। उसने कहा है कि तालिबान अफगानियों को चीन के शिनजियांग प्रांत के उइगर मुसलमानों का समर्थन करने से रोक रहा है।’

बताया जाता है कि कुछ इस्लामी गुटों की शिकायत है कि तालिबान चीन के आगे झुक रहा है। इसलिए वे तालिबान से नाराज हैं। नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में फेलॉ कबीर तनेजा ने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से कहा- ‘निवेश और धन के स्रोत के रूप में तालिबान के सामने सबसे अच्छा विकल्प चीन है। चीन तालिबान से तौबा तो नहीं करेगा, लेकिन अगर हालत बिगड़े तो यह आकलन उसे जरूर करना होगा कि अफगानिस्तान में उसे किस हद तक आगे बढ़ना चाहिए।’

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