अमेरिकी पनडुब्बी हमले में डूबे ईरानी युद्धपोत के 32 जीवित बचे सैनिकों को श्रीलंका ने ईरान वापस भेज दिया है। इनके साथ अन्य ईरानी नौसैनिकों को भी विशेष विमान से रवाना किया गया। इस पूरी घटना के दौरान भारत ने भी एक अन्य ईरानी जहाज 'आईआरआईएस लावन' को कोच्चि में तकनीकी सहायता देकर मानवीय मिसाल पेश की, जिसकी सराहना खुद ईरान ने की है।
अमेरिकी पनडुब्बी के हमले का शिकार हुए ईरानी नौसैनिक जहाज आईआरआईएस डेना के जीवित बचे 32 नाविकों की आखिरकार वतन वापसी हो गई है। श्रीलंका के उप रक्षामंत्री अरुणा जयसेकरा ने इसकी पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि इन 32 जीवित बचे लोगों के साथ ईरानी नौसेना के एक अन्य जहाज 'आईआरआईएस बुशहर' पर मौजूद 200 से अधिक कर्मियों को एक विशेष चार्टर्ड विमान के जरिए ईरान भेज दिया गया है।
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समंदर में क्या हुआ था?
घटना की जड़ें मार्च के शुरुआती दिनों से जुड़ी हैं। पश्चिम एशिया में जारी सैन्य तनाव की आग हिंद महासागर तक पहुंच गई थी। श्रीलंका के पास अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में एक अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी युद्धपोत आईआरआईएस डेना पर हमला कर उसे डुबो दिया था। यह हमला इतना भीषण था कि जहाज पर सवार 87 सैनिकों की मौके पर ही मौत हो गई। श्रीलंका की नौसेना ने बड़ा बचाव अभियान चलाया, जिसमें उन्होंने 87 शव बरामद किए थे और मौत के मुंह से 32 सैनिकों को सुरक्षित बाहर निकाला था।
संकट में फंसे अन्य जहाज
आईआरआईएस डेना के डूबने के बाद ईरान के दो अन्य जहाज, बुशहर और लावन भी तकनीकी और रणनीतिक कारणों से दक्षिण एशियाई देशों की शरण में थे। आईआरआईएस बुशहर ने छह मार्च को श्रीलंकाई जलक्षेत्र में प्रवेश की अनुमति मांगी थी, जिसके बाद से इसके कर्मचारी श्रीलंकाई नौसेना की सुरक्षा में थे। वहीं, आईआरआईएस लावन नाम का जहाज तकनीकी खराबी के कारण केरल के कोच्चि बंदरगाह पहुंचा था। भारत ने विषम परिस्थितियों को देखते हुए इस ईरानी जहाज को आपातकालीन रुकने की अनुमति दी थी।
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने राज्यसभा में इस बात की जानकारी दी कि ईरान ने भारत के इस कदम के लिए आभार व्यक्त किया है। उन्होंने सदन को बताया, 'ईरान ने 20 फरवरी, 2026 को अपने तीन जहाजों के लिए अनुमति मांगी थी, जिसे एक मार्च को स्वीकार कर लिया गया। आईआरआईएस लावन चार मार्च को कोच्चि पहुंचा। संकट के समय किसी की मदद करना ही सही कदम है।'