ईरान और इस्राइल के बीच बढ़ते युद्ध ने अब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को खतरे में डाल दिया है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के प्रमुख फातिह बिरोल ने चेतावनी दी है कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो इसका असर हर देश पर पड़ेगा। तेल संकट गहराने के साथ वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ती जा रही है और ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
बिरोल ने कैनबरा में कहा कि यह संकट 1970 के दशक के तेल झटकों से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। उन्होंने बताया कि मध्य पूर्व में चल रही हिंसा के कारण ऊर्जा ढांचा तेजी से प्रभावित हो रहा है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि कई देशों में बिजली और तेल आपूर्ति पर असर दिखने लगा है।
कितना गंभीर है मौजूदा ऊर्जा संकट?
आईईए प्रमुख के मुताबिक, यह संकट तेजी से वैश्विक रूप ले रहा है। उन्होंने कहा कि दुनिया का कोई भी देश इससे अछूता नहीं रहेगा। ऊर्जा आपूर्ति में रुकावट और कीमतों में उछाल से आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। यह संकट सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि बिजली और गैस पर भी असर डाल रहा है।
ऊर्जा ढांचे को कितना नुकसान हुआ है?
बिरोल ने बताया कि मध्य पूर्व के 9 देशों में करीब 40 ऊर्जा संयंत्र बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। इससे उत्पादन और सप्लाई दोनों पर असर पड़ा है। लगातार हमलों के कारण ऊर्जा नेटवर्क कमजोर हो रहा है, जिससे आने वाले समय में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
क्या तेल बाजार में और उथल-पुथल होगी?
तेल की कीमतों में पहले ही उछाल देखने को मिल रहा है। आईईए अब यूरोप और एशिया के देशों के साथ मिलकर अतिरिक्त तेल भंडार जारी करने पर विचार कर रहा है। इसका मकसद बाजार को स्थिर करना है, लेकिन अगर युद्ध लंबा चला, तो कीमतों में और तेजी आ सकती है।
होर्मुज को लेकर क्या है नया तनाव?
ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण बनाए रखा है, जो दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है। इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है कि वह इस मार्ग को जहाजों के लिए खोले। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि ऐसा नहीं होने पर अमेरिका ईरान के बिजली संयंत्रों को निशाना बना सकता है।
मौजूदा हालात बेहद संवेदनशील हैं। अगर तनाव और बढ़ता है, तो यह वैश्विक आर्थिक संकट में बदल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में तेल, गैस और बिजली की कीमतों में और उछाल आ सकता है। दुनिया की नजर अब इस बात पर है कि क्या कूटनीति से हालात संभलेंगे या संकट और गहराएगा।
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