हॉर्मुज के तंग समुद्री रास्ते में अब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की सांस अटकी है। ईरान इस जलडमरूमध्य के बड़े हिस्से को नियंत्रित करता है, जहां से दुनिया की जरूरत के 20 फीसदी तेल की आवाजाही होती है। ईरान पर अमेरिका-इस्राइल के हमले के बाद सवाल और भी हैं। जैसे- क्या यह अमेरिका की अपनी जरूरत थी या किसी और का एजेंडा? क्या यह युद्ध कूटनीति की विफलता है? अब दुनिया के बाकी देशों का रुख क्या रहेगा? विशेषज्ञ दे रहे हैं इन सवालों के जवाब...
अमेरिका की नीति क्या रही है?
विदेशी मामलों के जानकार संजीव श्रीवास्तव ने 'अमर उजाला' से बातचीत में कहा कि अमेरिका और इस्राइल की ईरान के प्रति सोच यही रही कि वहां सत्ता बदलनी चाहिए। 1979 के बाद अमेरिका में जितने भी राष्ट्रपति सत्ता में आए, सभी की मंशा यही थी कि ईरान में तख्तापलट किया जाए। जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने ईरान को 'एक्सिस ऑफ इविल' वाले देशों में से एक बताया था। 1979 में जिमी कार्टर के कार्यकाल के समय अमेरिकी दूतावास पर 444 दिन तक ईरान का कब्जा था। ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में ईरान के तेल आपूर्ति कारोबार पर रोक लगा दी थी। वे ईरान को आर्थिक दबावों में ला रहे थे।
ट्रंप ने क्या किया?
वे बताते हैं कि अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप ने यह साफ कर दिया था कि ईरान पर अब तक सर्वाधिक दबाव डाला जाएगा। ट्रंप ने भी अपने दूसरे कार्यकाल में देखा कि ईरान में आंतरिक विद्रोह बढ़ रहा है। इसके बाद उन्होंने ईरान के आसपास अमेरिका के सैन्य ठिकानों को मजबूत करना शुरू कर दिया। अमेरिका-इस्राइल ने देखा कि ईरान की सत्ता के अंदर दरारें गहरी होती जा रही हैं। तब हमले का विकल्प चुना गया।
इस्राइल की क्या भूमिका रही? क्या ईरानी शर्तों पर राजी था?
श्रीवास्तव कहते हैं कि इस्राइल यह मानता था कि ईरान पर जब तक कार्रवाई नहीं होगी, उसका भविष्य सुरक्षित नहीं होगा। उसने ईरान के अंदर हो रहे विद्रोह का फायदा उठाया। अमेरिका से हाथ मिलाया और ऑपरेशन को अंजाम दिया। अब ईरान के मौजूदा नेतृत्व को टकराव की तरफ कदम बढ़ाने से खुद को रोकना होगा। उन्हें जज्बात को काबू में रखना होगा। उनके पास कुछ दिनों से ज्यादा लड़ने की क्षमता नहीं होगी। कयास और अटकलें तो इसी तरह की हैं कि ईरान शायद शर्तों पर राजी हो गया था, लेकिन यह भी याद रखना होगा कि खामेनेई हमेशा से टकराव की मुद्रा में रहे थे। वे अपने मुल्क में कमजोर पड़ रहे थे, लेकिन अमेरिका और इस्राइल के खिलाफ उनके आक्रामक रुख में कोई कमी नहीं आई।
हमलों के बाद ईरान से क्या चूक हुई? अब आगे क्या?
वे बताते हैं कि ईरान ने खाड़ी के देशों के एयरपोर्ट, इमारतों, होटलों पर मिसाइलें दागकर गलती की। उसने हड़बड़ाहट में 'विनाश काले विपरीत बुद्धि' वाला काम किया है। इसके बाद रूस और चीन भी दखल देने को तैयार नहीं होंगे। इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स अगर अभी नहीं रुके, तो ईरान के लिए आने वाले वक्त में और मुश्किलें पैदा होंगी। ट्रंप ने साफ किया था कि अगर वे हथियार डाल देते हैं, तो माफी मिलेगी। ऐसा नहीं हुआ, तो उन्हें मौत का सामना करना होगा। इस जंग में अब ईरान के लिए लंबा टिक पाना मुश्किल है क्योंकि उसकी मिसाइलों का जखीरा लगातार कम हो रहा है। उधर, सुन्नी मुस्लिम देशों, ईसाई देशों और यहूदी देश वाले इस्राइल के बीच अब्राहम अकॉर्ड पर बात हो रही थी। ईरान को यह पसंद नहीं आ रहा था। अब ट्रंप चाहेंगे कि रिश्तों को सामान्य बनाने की यह प्रक्रिया दोबारा शुरू हो।
अब भारत क्या करेगा?
संजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि भारत सुन्नी और शिया बहुल आबादी वाले देशों से समान रूप से अच्छे रिश्ते चाहता है। भारत आपसी सम्मान और शांति चाहता है। आधिकारिक वक्तव्यों में भी भारत बातचीत पर जोर देता है। हमारी विदेश नीति अब प्रो-एक्टिव हो गई है। हम रचनात्मक कदम में विश्वास रखते हैं। पश्चिम एशिया में भारत का प्रभाव मजबूत हुआ है। वहां हालात जटिल हैं, लेकिन भारत का रुख संतुलित रहा है। भारत के इस रुख से सभी पक्ष संतुष्ट हैं।
क्या यह युद्ध अमेरिका की अपनी पसंद था?
वॉशिंगटन स्थित सेंटर फॉर इंटरनेशनल पॉलिसी की वरिष्ठ फेलो नेगार मोर्तजवी ने अल जजीरा को बताया, "यह एक बार फिर वह युद्ध है, जिसे अमेरिका ने अपनी मर्जी से चुना, वह भी इस्राइल के धक्का लगाने पर। यह एक और इस्राइली युद्ध है, जिसे अमेरिका लड़ रहा है। इस्राइल दो दशकों से अमेरिका को ईरान पर हमले के लिए धकेलता रहा और आखिरकार उसे कामयाबी मिल गई। जो खुद को शांति का राष्ट्रपति कहते हैं, वही इस युद्ध के सूत्रधार हैं।''
बातचीत के बीच हमला क्यों हुआ?
नेशनल ईरानियन अमेरिकन काउंसिल (NIAC) के अध्यक्ष जमाल अब्दी ने अल जजीरा से कहा, "नेतन्याहू का एजेंडा हमेशा से कूटनीतिक समाधान को रोकना रहा है। उन्हें डर था कि ट्रंप वाकई समझौता करने के बारे में गंभीर हैं इसलिए वार्ता के बीच यह युद्ध शुरू करवाना उनकी सफलता है, ठीक वैसे ही जैसे पिछले जून में हुआ था। ट्रंप का सत्ता-परिवर्तन वाला रुख नेतन्याहू की एक और जीत है और अमेरिकी जनता की हार, क्योंकि यह देश को एक लंबे और अप्रत्याशित सैन्य दलदल की ओर धकेल सकता है।''
ईरानी जनता की भावनाओं की इस पूरे समीकरण में क्या भूमिका निभा रही है?
मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो एलेक्स वटंका ने सीएनएन को बताया कि जनवरी में हुए नरसंहार के बाद ईरानी जनता में अपनी ही सरकार के प्रति नफरत असाधारण रूप से बढ़ गई थी। अगर आप व्हाइट हाउस में बैठे हैं या येरुशलम में, तो आप इसे एक अवसर के रूप में देखते हैं। शासन कमजोर था और यही कमजोरी एक अवसर बन गई।
क्या ट्रंप वाकई समझौता चाहते थे या यह सत्ता-परिवर्तन की रणनीति है?
कतर विश्वविद्यालय में गल्फ पॉलिटिक्स के प्रोफेसर लुसियानो जक्कारा ने अल जजीरा को बताया कि ईरान की राजनीतिक व्यवस्था इस स्थिति के लिए पहले से तैयार थी। खामेनेई की हत्या की आशंका वास्तविक मानी जा रही थी। ट्रंप सर्वश्रेष्ठ समझौता चाहते होंगे, लेकिन उनका तरीका बातचीत का नहीं, अधिकतम का तबाही का है। यह शर्तें थोपने का रास्ता है, बातचीत का नहीं। ट्रंप ईरानी शासन का समर्पण चाहते हैं, बदलाव नहीं।
इस युद्ध का तेल बाजार पर क्या असर पड़ेगा?
आईसीआरए लिमिटेड के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और कॉर्पोरेट रेटिंग्स के को-ग्रुप हेड प्रशांत वशिष्ठ ने पीटीआई को बताया कि बढ़ती शत्रुता और तेल उत्पादकों पर हमलों की रिपोर्टें कच्चे तेल की कीमतों में भारी उथल-पुथल पैदा कर सकती हैं। अगर यह संघर्ष कई उत्पादक देशों तक फैला, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार और भी जटिल हो जाएगा।
रॉयल बैंक ऑफ कनाडा (RBC) के विश्लेषकों ने द गार्जियन को बताया कि खाड़ी के क्षेत्रीय नेताओं ने अमेरिका को पहले ही आगाह किया था कि ईरान से टकराव के जोखिम रहेंगे और 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर का तेल दुनिया के लिए चुनौती होगा।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने का खतरा कितना गंभीर है?
बाजार विश्लेषक टोनी साइकमोर ने द गार्जियन से कहा कि अमेरिका और इस्राइल के ईरान पर हमलों ने अनिश्चितता बढ़ा दी है। खासतौर पर हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली आपूर्ति में बाधाएं आएंगी। जोखिम प्रबंधन कंसल्टेंसी 'मार्श' के समुद्री युद्ध विशेषज्ञ डिलन मोर्टिमर ने और भी सीधे खतरे गिनाए। उन्होंने कहा, "मुख्य जोखिम फारस की खाड़ी और अरब सागर में केंद्रित हैं। खासतौर पर ईरानी बलों द्वारा जहाजों को रोकने और जब्त करने का खतरा, और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने का जोखिम। क्षेत्र में इतनी बड़ी सैन्य तैनाती को देखते हुए समुद्री चालक दल पहले से कहीं ज्यादा आशंकित हैं। स्थिति लगातार बदल रही है।"
OPEC इस संकट में क्या कदम उठा रहा है?
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार जब पश्चिम एशिया युद्ध की आग में है, तो OPEC+ के आठ देशों ने अप्रैल में तेल उत्पादन बढ़ाने का सैद्धांतिक समझौता किया है। पहले 1,37,000 बैरल प्रतिदिन बढ़ाने की योजना थी, जिसे अब बढ़ाकर 2,06,000 बैरल प्रतिदिन कर दिया गया है। यह कदम बाजार को स्थिर रखने की कोशिश है, लेकिन विशेषज्ञों की चेतावनी साफ है कि अगर हॉर्मुज का रास्ता बंद हुआ, तो कोई भी उत्पादन वृद्धि काफी नहीं होगी।