ईरान परमाणु समझौते को पुनर्जीवित करने के लिए यहां चल रही बातचीत एक कठिन दौर में पहुंच गई है। ईरान की समाचार एजेंसी इरना ने एक रिपोर्ट में कहा है- ‘बातचीत अब बारीक ब्योरे के दौर में पहुंच गई है। यह बातचीत का सबसे कठिन हिस्सा है।’ ये बातचीत बीते सोमवार को फिर से शुरू हुई थी।
समझौते को फिर से जीवित करने के लिए बातचीत छह महीने पहले वियना में शुरू हुई थी। इस बातचीत में अमेरिका और ईरान के अलावा चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, रूस, जर्मनी और यूरोपियन यूनियन शामिल हैं। ईरान ने सीधे अमेरिका से बातचीत करने से इनकार कर रखा है। इसीलिए यहां सारी बातचीत यूरोपीय, रूसी और चीनी वार्ताकारों की मध्यस्थता से हो रही है। बताया जाता है कि इससे इन वार्ताओं में चीन को अपनी एक खास भूमिका बनाने का अवसर मिला है।
चीनी मीडिया से बातचीत में वियना वार्ता में शामिल चीन के दूत वांग चुन ने कहा है कि चीन इन वार्ताओं में ‘अनूठा और रचनात्मक’ रोल निभा रहा है। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक भी इस बात से सहमत हैं कि वियना वार्ता चीन के लिए लाभकारी साबित हो रही है। पेरिस स्थित एशिया सेंटर में चीन विशेषज्ञ ज्यां फ्रांक्वा दि मेग्लियो ने फ्रांस के टीवी चैनल फ्रांस-24 से कहा- "चीन की दिलचस्पी इसमें है कि ये समझौता जल्द से जल्द हो जाए। इससे उसे कच्चे तेल के नए स्रोत ढूंढने में मदद मिलेगी। साथ ही ईरान से उसके भू-राजनीतिक संबंध तब और ज्यादा भी मजबूत हो जाएंगे।"
विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन कर चीन लगातार ईरान से तेल का आयात कर रहा है। अगर परमाणु समझौता होने की वजह से ईरान के ऊपर से अमेरिकी प्रतिबंध हट जाते हैं, तो उसके लिए ऐसा करना और आसान हो जाएगा। उस हाल में पश्चिम एशिया में चीन का कूटनीतिक दखल और बढ़ेगा। चीन इसी कोशिश में जुटा हुआ है।