अमेरिका और इस्राइल के साथ बढ़ते सैन्य टकराव के बीच ईरान ने बड़ा दावा किया है। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड यानी IRGC ने कहा है कि उसने अमेरिकी नौसेना के विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन को निशाना बनाते हुए चार बैलिस्टिक मिसाइल दागी हैं। हालांकि एक अमेरिकी अधिकारी ने अल जजीरा को बताया है कि USS अब्राहम लिंकन पर ईरान के मिसाइल हमले से एयरक्राफ्ट कैरियर पर कोई असर नहीं पड़ा, और उसका ऑपरेशन जारी है।
क्या है ईरान का दावा?
आईआरजीसी ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस-4 के तहत अमेरिका और इस्राइल के सैन्य ठिकानों पर हमले जारी हैं। इसी अभियान के दौरान अमेरिकी विमानवाहक पोत अब्राहम लिंकन पर चार बैलिस्टिक मिसाइलें दागी गईं। यह बयान ईरानी समाचार एजेंसी के जरिए जारी किया गया। हालांकि अमेरिका की ओर से अभी तक इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
हमलों का नया चरण क्यों बताया गया?
आईआरजीसी ने कहा कि ईरानी सशस्त्र बलों की कार्रवाई अब नए चरण में प्रवेश कर चुकी है। संगठन के अनुसार अब जमीन के साथ-साथ समुद्री मोर्चे पर भी हमले तेज किए जाएंगे। बयान में कहा गया कि अमेरिकी और इस्राइली लक्ष्यों के खिलाफ अभियान लगातार जारी रहेगा और क्षेत्र में सैन्य दबाव बढ़ाया जाएगा।
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समुद्र में बढ़ता सैन्य खतरा क्या संकेत देता है?
विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अगर समुद्र में तैनात अमेरिकी युद्धपोतों को निशाना बनाया जाता है तो संघर्ष और व्यापक हो सकता है। विमानवाहक पोत किसी भी देश की सबसे मजबूत सैन्य शक्ति माने जाते हैं। ऐसे में इस तरह का दावा पश्चिम एशिया में युद्ध के दायरे के बढ़ने का संकेत माना जा रहा है।
अब तक क्या स्थिति सामने आई?
- ईरान ने चार बैलिस्टिक मिसाइल दागने का दावा किया।
- निशाना अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर अब्राहम लिंकन बताया गया।
- अमेरिका की ओर से हमले की पुष्टि नहीं हुई।
- आईआरजीसी ने कहा कि कार्रवाई जमीन और समुद्र दोनों मोर्चों पर जारी रहेगी।
अमेरिका और इस्राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद क्षेत्र में लगातार जवाबी कार्रवाई हो रही है। ईरान पहले ही अमेरिकी और सहयोगी ठिकानों को निशाना बनाने की चेतावनी दे चुका था। अब समुद्री क्षेत्र में हमले के दावे से पश्चिम एशिया का संकट और गहरा होता दिखाई दे रहा है।
माना जा रहा है कि यदि समुद्री रास्तों और सैन्य जहाजों पर हमले बढ़ते हैं तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल आपूर्ति पर सीधा असर पड़ सकता है। इससे वैश्विक सुरक्षा और ऊर्जा बाजार दोनों में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है।
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