संयुक्त राष्ट्र में भारत ने कहा कि महिला शांति सैनिक संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में महिलाओं और बच्चों के लिए उम्मीद और सुरक्षा का प्रतीक हैं। वर्तमान में 160 से अधिक भारतीय महिला शांतिदूत कई संयुक्त राष्ट्र मिशनों में कार्यरत हैं। भारत महिला सशक्तिकरण और शांति निर्माण में वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने कहा कि भारतीय महिला शांति सैनिक संघर्ष क्षेत्रों में महिलाओं और बच्चों के लिए उम्मीद की किरण बन रही हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान में 160 से अधिक भारतीय महिलाएं अलग-अलग यूएन मिशनों में सेवा दे रही हैं।
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महिला शांतिदूत का बढ़ता योगदान
सुरक्षा परिषद में 'महिलाएं, शांति और सुरक्षा' विषय पर हुई बहस में पी. हरीश ने कहा कि महिला सैनिक समुदायों में भरोसा पैदा करती हैं और खासकर महिलाओं व बच्चों को सुरक्षा का एहसास दिलाती हैं। वे लैंगिक हिंसा जैसे मामलों को समझने और रोकने में भी अहम भूमिका निभाती हैं। उन्होंने भारतीय सेना की मेजर अभिलाषा बराक का जिक्र किया, जिन्हें हाल ही में संयुक्त राष्ट्र का जेंडर एडवोकेट अवॉर्ड मिला है। इससे पहले भी दो भारतीय महिलाएं यह सम्मान पा चुकी हैं।
भारत की ऐतिहासिक पहल
भारत ने सबसे पहले लाइबेरिया में संयुक्त राष्ट्र मिशन के तहत पूरी तरह महिला यूनिट तैनात की थी। इससे हजारों स्थानीय महिलाओं को पुलिस में शामिल होने की प्रेरणा मिली। दिल्ली में बनाए गए संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना केंद्र के जरिए भारत दुनिया भर की महिला सैन्य अधिकारियों को प्रशिक्षण भी दे रहा है। पिछले साल 15 देशों की महिलाओं ने इसमें हिस्सा लिया, जबकि 35 देशों की महिला शांतिदूत एक सम्मेलन में शामिल हुईं।
महिलाओं को सशक्त बनाना जरूरी
पी. हरीश ने कहा कि शांति कायम रखने के प्रयास तभी सफल होंगे जब महिलाओं को राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाया जाएगा। उन्होंने भारत में पंचायतों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण और 2023 के महिला आरक्षण कानून का उदाहरण दिया। भारत में महिलाओं ने ऊंचे पदों पर भी अहम भूमिका निभाई है, जैसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी।
संयुक्त राष्ट्र की राय
संयुक्त राष्ट्र - महिला की प्रमुख सीमा बहौस ने कहा कि लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण शांति स्थापित करने के सबसे प्रभावी तरीके हैं। उन्होंने बताया कि 2000 में पास किए गए प्रस्ताव के बाद यह साबित हुआ है कि महिलाओं की भागीदारी से हिंसा कम होती है और शांति लंबे समय तक टिकती है। वहीं महिला अधिकार कार्यकर्ता काव्या असोका ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून कमजोर हो रहा है और सिर्फ निंदा से काम नहीं चलेगा। उन्होंने हथियारों की आपूर्ति रोकने जैसे ठोस कदम उठाने की मांग की।