भारत के हिंगोली जिले में होंगे लिगो से प्रयोग
जिस तरह से भारतीय वैज्ञानिक नित्य नए प्रयोगों में जुटे हुए हैं ऐसा माना जा रहा है कि 2025 के अंत तक इसपर सफलता हासिल कर सकते हैं। गुरुत्व तरंगों के अस्तित्व को प्रमाणित करने वाली लिगो परियोजना से जुड़े अध्ययन अमेरिका के बाहर पहली बार भारत में होंगे और यह भारतीय वैज्ञानिकों के लिए बड़ी सफलता के तौर पर देखा जा रहा है।
इसके लिए अमेरिका के नेशनल साइंस फाउंडेशन तथा भारत के डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी तथा डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के बीच एक डील साइन हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रयोग के लिए चार किलोमीटर की पट्टी जरूरी होती है, जिसके दोनों ओर 150 मीटर का खाली क्षेत्र हो, जहां लेजर का अध्ययन किया जा सके। ऐसे में परियोजना की स्थापना के लिए महाराष्ट्र के हिंगोली जिले को चुना गया है। इस परियोजना पर 1200 से 1300 करोड़ रुपए की लागत आएगी, इसके वर्ष 2025 के अंत तक शुरू होने की उम्मीद है।
क्यों अहम है यह खोज
लिगो से पहले किसी भी वैज्ञानिक शोध में प्रकाशीय संकेत ही हमारी खोजों के आधार रहे हैं। इन्हीं संकेतों के विश्लेषण से ही तारों के ताप, द्रव्यमान, उपस्थित तत्व, चुम्बकीय क्षेत्र, उनके केंद्र में चल रही क्रियाओं और ब्रह्मांड के लगातार फैलने आदि के संबंध में कई अहम जानकारियां जुटाई हैं।
लेकिन ब्लैक होल के मामले में वैज्ञानिक लगातार पिछड़ते रहे थे। ऐसा माना जा रहा है कि इस खोज के बाद हम इसमें भी बड़ी कामयाबी हासिल कर सकेंगे। क्योंकि ब्लैक होल अंतरिक्ष का वह क्षेत्र है, जहां से शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण के कारण प्रकाश भी बाहर नहीं निकल पाता।
इसलिए ये नजर नहीं आते। मगर इनके टकराने से पैदा हुईं तरंगें लगातार धरती तक आ रही हैं और इनके होने का प्रमाण दे रही हैं। इस पर शोध में जुटे वैज्ञानिकों ने गणना की है कि ये पृथ्वी से 1.4 अरब प्रकाशवर्ष दूर हैं। इनके टकराने से पहले इन ब्लैक होल का द्रव्यमान सूर्य से क्रमश: 14.5 तथा 7.5 गुना था। अब ये सूर्य के द्रव्यमान से 20.8 गुना बड़ा घेरा बना चुका है।
कैसे हुई स्थापना?
वैज्ञानिकों का मानना है कि ये गुरुत्वीय तरंगें कुछ किलोमीटर से लेकर कई प्रकाशवर्ष की हो सकती हैं। मगर पृथ्वी तक पहुंचते-पहुंचते इनकी तीव्रता बेहद कम हो जाती है। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती ऐसी साइट्स का चुनाव था, जहां वाहनों की आवाजाही न हो और भूकंपीय झटकों का कम से कम प्रभाव हो। इसके लिए अमेरिका में 3002 किलोमीटर की दूरी पर स्थित दो स्थान वाॅशिंगटन के हेनफोर्ड तथा लुसियाना के लिविंग्स्टन का चयन किया गया।
यहां कुछ किलोमीटर लंबी गुरुत्वीय तरंगों को मापने में सक्षम इंटरफेरोमीटर की 'L' आकार की भुजाओं को 4 किलोमीटर तक फैलाया गया है। इन दोनों ऑब्जर्वेटरीज की स्थापना 1999 में ही की गई थी जबकि आधिकारिक तौर पर इसके प्रयोग 2002 से शुरू हुए। हालांकि शुरुआती आठ वर्षों तक वैज्ञानिकों को कोई सफलता नहीं मिली थी।
जब डगमगाया था आईंस्टीन का विश्वास
विज्ञान प्रत्यक्ष को मानता है। ऐसे में कई ऐसे पल आते हैं जब वैज्ञानिकों का विश्वास भी डगमगाता है। अल्बर्ट आइंस्टीन ने इस वेव्स को लेकर सिद्धांत दिया था, तब कहा था कि ये इतनी हल्की हैं कि इन्हें पकड़ना बहुत मुश्किल काम है। वैज्ञानिको को इसे पकड़ने में भारी मशक्कत करनी होगी। लेकिन वेव्स के मामले में उनका विश्वास भी 1930 तक उठने लगा था। लेकिन वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता तब मिली जब 1970 के दशक में साइंटिस्ट्स ने इसे लेकर पहली बार छोटा सा सबूत हासिल किया था।
कैसे काम करती है तकनीक?
गुरुत्वीय तरंगों को प्रमाणित इंटरफेरोमीटर के जरिए किया जाता है। 1960 में प्रकाश के स्रोत 'लेसर' की खोज के बाद विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में बड़े बदलाव आए। इंटरफेरोमीटर में अब लेसर की मदद से प्रयोग होने लगा। अब ये प्रयोग 'लेसर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल वेव आब्जर्वेटरीज' में हो रहे हैं। यही नहीं लेसर बीम को एक स्प्लीटर की सहायता से दो भागों में बांटा जा सकता है यही नहीं यदि स्पेसटाइम की सतह सपाट है तो दोनों बीम समान अवधि में एक दूसरे से आकर मिल जाती हैं।