ऐसी स्थिति में इस इलाके में तनाव की स्थिति बढ़ने की बात कही जा रही है। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब होरमुज जलमरूमध्य में तेल को लेकर मचे घमासान के बीच कोई अन्य विकल्प भी ढूंढ रहे हैं। इसके लिए ज्यादा पाइपलाइन बनाने की भी तैयारी है। इलाके में तनाव का नतीजा तेल टैंकरों को भुगतना पड़ा है।
कच्चे तेल का सफर
- रिफायनरी: कच्चा तेल या क्रूड उत्पादन करने वाले देशों से आयात करने के बाद रिफायनरी तक पहुंचता है। यहां कच्चे तेल से पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम पदार्थ निकाले जाते हैं।
- कंपनियां: इसके बाद पेट्रोलियम कंपनियां इन उत्पादों से अपना मुनाफा कमाती हैं और पेट्रोल पंप तक तेल पहुंचाती हैं।
- पेट्रोल पंप: देशभर में फैले पेट्रोल पंप नेटवर्क के जरिए कंपनियां पेट्रोल और डीजल को बेचती हैं। इसमें पेट्रोल पंप मालिक अपना तयशुदा कमीशन कमाता है।
- खरीदार: ये केंद्र और राज्य सरकार के लिए एक्साइज ड्यूटी, वैट और अन्य स्थानीय टैक्स देकर पेट्रोल और डीजल खरीदता है।
होरमुज में अमेरिकी नौसेना ने बढ़ाई अपनी उपस्थिति
इस क्षेत्र में होने वाली घटनाओं के इतिहास को देखते हुए अमेरिका ने हाल में इस क्षेत्र में अपने नौसेना बल की तैनाती में इजाफा किया है। अमेरिकी नौसेना का पांचवां बेड़ा पहले से ही मध्यपूर्व में तैनात है। अमेरिकी नौसेना का मुख्यालय बहरीन का मनामा इलाका है। वहीं ईरान ने परमाणु समझौते पर नई रूपरेखा बनाने के लिए यूरोप को सात जुलाई तक का समय दिया है।
तेल की कीमतें पेंडुलम की तरह चलती हैं। कुछ ही घंटों में इनकी वजह से किसी देश की अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है। पिछले वर्षों की तुलना में तेल की कीमतें भी बढ़ गई हैं। तेल की कीमतों पर नजर रखने वाले जानकार अब ये कहने लगे हैं कि सस्ते तेल के दिन लदने अब शुरू हो गए हैं।
तेल का बाजार
ये हमेशा से होता आया है कि तेल का बाजार अनिश्चितताओं भरा रहता है और इसमें कीमतों के बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। अमेरिकी बैंकों और कई वित्तीय संस्थाओं ने पहले ही कच्चे तेल की कीमत बढ़ने की भविष्यवाणी की थी।
सेंट पीट्सबर्ग में आयोजित इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम की बैठक में इस साल तेल के उत्पादन में कटौती पर सहमति बनी थी। हालांकि जानकार लोगों ने इस घोषणा को ज्यादा अहमियत नहीं दी थी। लेकिन तीन ऐसे कारण हैं जो बताते हैं कि सस्ता तेल अब बीते जमाने की बात बनता जा रहा है।
पहला कारण: तेल की आपूर्ति में कटौती
दुनिया को तेल बेचने वाले देश आपूर्ति में कटौती की एक योजना पर सख्ती से अमल कर रहे हैं। उनका इरादा तेल के उत्पादन को 1.8 मिलियन बैरल प्रति दिन के पैमाने तक ले जाने का है। दरअसल वो चाहते हैं कि दुनिया में तेल की मांग बढ़े और साथ ही कीमतें भी।
दूसरा कारण: ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध
ईरान का मुद्दा तेल की कीमतों में हुए इजाफे का एक बड़ा कारण है। दरअसल ईरान पर प्रतिबंधों की आशंका के बाद से ही तेल की कीमतें चढ़ने लगी थीं और जब इन प्रतिबंधों की घोषणा हुई तो कीमतें एक बार फिर बढ़ीं थीं।
तीसरा कारण: वेनेजुएला में तेल उत्पादन में कमी
वेनेजुएला के राजनीतिक संकट का खामियाजा उसके तेल उद्योग को काफी हद तक भुगतना पड़ा है। पिछले दो साल में उसके उत्पादन में एक तिहाई कटौती हुई है।
भारत-ईरान संबंध
भारत और ईरान के बीच गहरे मजबूत कूटनीतिक संबंध रहे हैं। ईरान दूसरा देश है जिससे भारत सबसे ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। पहला स्थान इराक का है। ईरान के लिए भारत भी सबसे ज्यादा तेल आयात करने वाले देशों में चीन के बाद दूसरा स्थान रखता है। इस वजह से दोनों देशों के बीच मजबूत संबंध हैं। इसके अलावा भारत आतंकवाद और पाकिस्तान के खिलाफ भी ईरान को अपना साझेदार मानता है।
ईरान और पाकिस्तान के बीच कभी भी मधुर संबंध नहीं रहे हैं। पाकिस्तान की भारत विरोधियों गतिविधियों के खिलाफ ईरान भारत का साथ देते रहा है। इसके अलावा पिछले साल ही ईरान के चबाहर में बंदरगाह के निर्माण करवाने में भारी निवेश किया है। इससे भारत को समुद्र के रास्ते अफगानिस्तान को भी सहायता देने में आसानी होगी। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज से ईरान मध्यपूर्व का एक महत्वपूर्ण देश है। अंतराराष्ट्रीय राजनीति में अकेला सा नजर आने वाला ईरान भू-रणनीतिक रूप से और प्राकृतिक तेल के भंडार के दृष्टिकोण से दुनिया की नजरों से अनदेखा नहीं रह पाता। इतिहास में यह क्षेत्र फारस के नाम से जाना जाता था।