मध्यस्थता की मुख्य भूमिका के श्रेय पर कही ये बात
यह पूछे जाने पर कि क्या मध्यस्थ की मुख्य भूमिका पहले से ही तुर्की के कब्जे में है, जयशंकर ने कहा, नहीं। लेकिन यह कोई सवाल नहीं है कि मध्यस्थ के रूप में श्रेय किसको मिलता है और कौन इसके लिए सुर्खियां बटौरता है।
भारत युद्ध मुनाफाकोर नहीं, यूक्रेन युद्ध से दोगुनी हुई तेल कीमत
यह पूछे जाने पर कि क्या भारत को पश्चिमी प्रतिबंधों में शामिल नहीं होने से फायदा हो रहा है। जयशंकर ने रूस से छूट पर उर्जा आयात के विचार को दृढ़ता से खारिज किया। उन्होंने कहा, मैं राजनीतिक और गणितीय रूप से इस बात को सिरे से खारिज करता हूं कि भारत युद्ध मुनाफाखोर हूं। यूक्रेन युद्ध के परिणामस्वरूप तेल की कीमतें दोगुनी हो गई हैं।
विदेश मंत्री ने कहा, ईरान के खिलाफ प्रतिबंधों या वेनेजुएला में जो हो रहा है, उससे भी तेल बाजार प्रभावित है। उन्होंने कहा, ऐसी स्थिति में सबसे अच्छे सौदे के लिए बाजार के आसपास देखना कूटनीतिक और आर्थिक समझ में आता है। अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो क्या यूरोप अधिक भुगतान करेगा? उन्होंने कहा, युद्ध छिड़ने के बाद यूरोप ने रूस से करीब 120 अरब डॉलर की उर्जा का आयात किया। यह हमारे द्वारा खरीदे गए से छह गुना ज्यादा है।
रूस से तेल आयात क्यों बढ़ा रहा भारत?
उनसे जब सवाल किया कि यूरोप ने अपने रूसी उर्जा आयात को कम कर दिया है, जबकि भारत अपनी खरीद बढ़ा रहा है, तो जयशंकर ने दो टूक पलटवार किया। उन्होंने पूछा, ऐसा क्यों है? जब यूरोप रूस से अपना आयात कम करता है, तो उसे अन्य तेल बाजारों में जाना पड़ता है और वे बाजार हमारे मुख्य स्त्रोत रहे हैं। यदि आप मेरा भोजन ले लेते हैं, तो मैं क्या करूं? भूखे रहूं। रूसी तेल की कीमत सीमा (प्राइस कैप) के बारे में विदेश मंत्री ने कहा, यह हमारे साथ विचार विमर्श किए बिना पश्चिमी देशों का फैसला था। हर देश को निर्णय लेने का अधिकार है। पिछले महीने प्रमुख पश्चिमी देशों ने रूसी तेल की कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल तय करने की घोषणा की।
मूल्य सीमा (प्राइस कैप) को लेकर विदेश मंत्री बोले- दुनिया ही बताएगी
भारत के लिए मूल्य सीमा की प्रासंगिकता के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इसका उर्जा बाजारों पर क्या प्रभाव पड़ता है। उन्होंने फिलहाल कोई नहीं जानता। इसलिए अगर कीमतें बढ़ती हैं, तो बाकी दुनिया बताएगी कि वे क्या सोचते हैं। जयशंकर नेकहा, यह कहना मुश्किल है कि यूक्रेन युद्ध अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को हिला रहा है या नहीं। लेकिन यूरोप में एक स्पष्ट मनोवैज्ञानिक प्रभाव है, जो लंबे समय के बाद नजदीकी संघर्ष से निपटने के लिए मजबूर है। इसके अलावा, रूस में हमेशा एक यूरोपीय-एशियाई द्वंद्व रहा है। लेकिन यह दो सिर वाला ईगल हमेशा एशिया की तुलना में यूरोप की ओर ज्यादा देखता था। रूसियों ने हमेशा खुद को यूरोपीय के रूप में देखा। यूक्रेन युद्ध के मद्देनजर यह एशिया में स्थानांतरित हो सकता है। इसके भू-राजनीतिक निहितार्थ हैं।
यूक्रेन पर हमले की भारत ने क्यों नहीं की निंदा?
यह पूछे जाने पर कि भारत ने उस प्रस्ताव का समर्थन क्यों नहीं किया, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने बहुत में यूक्रेन पर आक्रमण की निंदा की थी, जयशंकर नेक हा, प्रत्येद देश अपने स्थान, हितों और इतिहास के अनुसार घटनाओं का आकलन करता है। एशिया में भी ऐसी घटनाएं होती हैं, तब यूरोप या लैटिन अमेरिका के देश कोई रुख अपनाने की जरूरत महसूस नहीं करते। यूक्रेन में जो हुआ वह यूरोप के करीब है।
'यूरोप का भारत और रूस के साथ अलग-अलग इतिहास'
उन्होंने कहा, 'यूरोप का रूस और भारत से अलग-अलग इतिहास रहा है। यूक्रेन में हमारे अलग-अलग हित हैं। लगभग सभी देश कहेंगे कि वे संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों का समर्थन करते हैं। लेकिन पिछले 75 साल की दुनिया को देखिए। क्या संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्यों ने वास्तव में हमेशा संयुक्त राष्ट्र चार्टर का पालन किया है और कभी किसी अन्य देश में सैनिक नहीं भेजे हैं?
चीन की चुनौती पर विदेश मंत्री ने क्या कहा?
हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए चीन की बढ़ती ताकत की चुनौती के बारे में पूछा गया तो जयशंकर ने कहा कि अगर किसी एक शक्ति का प्रभुत्व है तो कोई भी क्षेत्र स्थिर नहीं होगा। उन्होंने कहा, 'भारत जितना आगे बढ़ेगा, हमारा आर्थिक वजन और राजनीतिक प्रभाव उतना ही अधिक होगा, यह न केवल हमारे लिए बल्कि दुनिया के लिए भी उतना ही बेहतर होगा। न केवल विश्व व्यवस्था, बल्कि एशिया को भी बहुध्रुवीय बनना चाहिए।
'अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए एक साथ आएं देश, संतुलन बनाएं'
उन्होंने कहा, 'कोई भी क्षेत्र स्थिर नहीं होगा अगर उस पर एक ही शक्ति का प्रभुत्व हो। अंतरराष्ट्रीय संबंधों का सार यह है कि देश साथ आएं और संतुलन बनाएं।