India-Afghanistan: अफगानिस्तान से दोस्ती क्यों बढ़ा रहा है भारत, क्या हैं इसे कूटनीतिक मायने? समझें
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु मिश्रा
Updated Thu, 01 Jun 2023 05:48 PM IST
सार
सवाल उठ रहा है कि तालिबानी शासन के बावजूद आखिर क्यों भारत अफगानिस्तान से दोस्ती का दायरा बढ़ा रहा है? इसके क्या मायने हैं? भारत को इससे कैसे फायदा मिल सकता है? आइए समझते हैं...
भारत और अफगानिस्तान
- फोटो : अमर उजाला
अफगानिस्तान पर तालिबान का शासन है। भारत ने अब तक तालिबान को मान्यता नहीं दी है, इसके बावजूद दोनों देशों के रिश्ते तेजी से मजबूत हो रहे हैं। भारत लगातार अफगानिस्तान की मदद कर रहा है। उधर, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तल्खियां बढ़ती जा रही हैं।
इसकी बानगी देखिए। अफगानिस्तान में भारत को मदद के तौर पर गेहूं पहुंचाना था। भारत ने पाकिस्तान की बजाय ईरान के रास्ते अफगानिस्तान तक मदद पहुंचाई। अभी आगे भी इसी रास्ते मदद पहुंचाई जााएगी। संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम के एक प्रवक्ता ने हाल ही में सूचित किया है कि आगामी महीनों में अफगानिस्तान में 20,000 मीट्रिक टन गेहूं का भारतीय दान अफगानिस्तान को मिलने वाला है।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि तालिबानी शासन के बावजूद आखिर क्यों भारत अफगानिस्तान से दोस्ती का दायरा बढ़ा रहा है? इसके क्या मायने हैं? भारत को इससे कैसे फायदा मिल सकता है? आइए समझते हैं...
भारत और अफगानिस्तान
- फोटो : अमर उजाला
अफगानिस्तान पर तालिबान का शासन है। भारत ने अब तक तालिबान को मान्यता नहीं दी है, इसके बावजूद दोनों देशों के रिश्ते तेजी से मजबूत हो रहे हैं। भारत लगातार अफगानिस्तान की मदद कर रहा है। उधर, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तल्खियां बढ़ती जा रही हैं।
इसकी बानगी देखिए। अफगानिस्तान में भारत को मदद के तौर पर गेहूं पहुंचाना था। भारत ने पाकिस्तान की बजाय ईरान के रास्ते अफगानिस्तान तक मदद पहुंचाई। अभी आगे भी इसी रास्ते मदद पहुंचाई जााएगी। संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम के एक प्रवक्ता ने हाल ही में सूचित किया है कि आगामी महीनों में अफगानिस्तान में 20,000 मीट्रिक टन गेहूं का भारतीय दान अफगानिस्तान को मिलने वाला है।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि तालिबानी शासन के बावजूद आखिर क्यों भारत अफगानिस्तान से दोस्ती का दायरा बढ़ा रहा है? इसके क्या मायने हैं? भारत को इससे कैसे फायदा मिल सकता है? आइए समझते हैं...
पहले जानिए अफगानिस्तान की कैसे मदद कर रहा भारत?
हमेशा से भारत अफगानिस्तान की मदद करता रहा है। तालिबान शासन आने के बाद भी भारत ने मदद नहीं रोकी। आंकड़ों के अनुसार, अभी भी हर साल कई हजार मीट्रिक टन गेहूं भारत से मदद के तौर पर अफगानिस्तान भेजा जा रहा है। इसके अलावा दवा व अन्य खाद्य पदार्थ भी मदद के तौर पर भारत से अफगानिस्तान जा रही है। हाल ही में बजट में भी अफगानिस्तान को मदद के लिए दो सौ करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। कुल मिलाकर देखें तो पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कई तरह के प्रोजेक्ट्स के जरिए अफगानिस्तान को चार अरब डॉलर से भी ज्यादा की मदद भेजी है।
अब जानिए भारत के लिए क्यों जरूरी है अफगानिस्तान?
इसे समझने के लिए हमने विदेश मामलों के जानकार डॉ. आदित्य पटेल से बात की। उन्होंने कहा, 'अफगानिस्तान को एशिया का चौराहा कहा जा सकता है। इसके चलते ये रणनीतिक तौर पर काफी महत्त्व रखता है। यह दक्षिण एशिया को मध्य एशिया और मध्य एशिया को पश्चिम एशिया से जोड़ता है। भारत का संपर्क ईरान, अजरबैजान, तुर्कमेनिस्तान तथा उज्बेकिस्तान के साथ अफगानिस्तान के माध्यम से होता है। इसलिये अफगानिस्तान भारत के लिये बहुत जरूरी है।'
उन्होंने आगे कहा, 'अफगानिस्तान भू-रणनीतिक दृष्टि से भी भारत के लिये महत्त्वपूर्ण है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह भारत और मध्य एशिया के मध्य स्थित है जो व्यापार की सुविधा भी प्रदान करता है। यह देश रणनीतिक रूप से तेल और गैस से समृद्ध मध्य-पूर्व और मध्य एशिया में स्थित है। अफगानिस्तान पाइपलाइन मार्गों के लिये भी महत्त्वपूर्ण है। साथ ही अफगानिस्तान कीमती धातुओं और खनिजों जैसे प्राकृतिक संसाधनों से भी समृद्ध है।'
डॉ. आदित्य कहते हैं, 'पाकिस्तान पर लगाम बनाए रखने के लिए भी अफगानिस्तान जरूरी है। अभी पाकिस्तान और अफगानिस्तान में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। ऐसे में इसका फायदा भी भारत उठा सकता है।'
अफगानिस्तान में क्यों बिगड़े हैं हालात?
डॉ. आदित्य के अनुसार, '90 के दशक में तालिबान का उदय उत्तरी पाकिस्तान में तब हुआ जब अफगानिस्तान से सोवियत संघ की सेना वापस जा रही थी। पश्तूनों के नेतृत्व में उभरा तालिबान, अफगानिस्तान में 1994 में सामने आया। माना जाता है कि तालिबान सबसे पहले धार्मिक आयोजनों या मदरसों के जरिये उभरा जिसमें ज्यादातर पैसा सऊदी अरब से आता था।'
डॉ. आदित्य आगे कहते हैं, 'सोवियत संघ के अफगानिस्तान से जाने के बाद वहां कई गुटों में आपसी संघर्ष शुरू हो गया था और मुजाहिद्दीनों से भी लोग परेशान थे। ऐसे हालात में जब तालिबान का उदय हुआ तो अफगान के लोगों ने उसका स्वागत किया था। शुरुआत में तालिबान को इसलिए लोकप्रियता मिली क्योंकि उन्होंने भ्रष्टाचार पर लगाम लगाया, अव्यवस्था पर अंकुश लगाकर अपने नियंत्रण में आने वाले इलाकों को सुरक्षित बनाया ताकि लोग व्यवसाय कर सकें। दक्षिण-पश्चिम अफगानिस्तान में तालिबान ने जल्द ही अपना प्रभाव बढ़ाया। सितंबर 1995 में तालिबान ने ईरान सीमा से लगे हेरात प्रांत पर कब्जा कर लिया।'
उन्होंने कहा, 'तालिबान के कब्जे के साथ ही अफगानी लोगों पर अत्याचार बढ़ने लगा। 2001 में अंतर्राष्ट्रीय आलोचना के बावजूद तालिबान ने विश्व प्रसिद्ध बामियान बुद्ध प्रतिमाओं को नष्ट कर दिया। पाक-अफगान सीमा पर पश्तून इलाके के बारे में तालिबान का कहना था कि वह वहां शांति और सुरक्षा का माहौल बनाएगा और सत्ता में आने के बाद शरिया लागू करेगा। इसकी आड़ में उत्तरी पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों जगह तालिबान ने इस्लामिक कानून के तहत सजा लागू की। हत्या के दोषियों को सार्वजनिक फांसी दी जाने लगी। चोरी करने के दोषियों के हाथ-पैर काटने लगे। दुनिया का ध्यान तालिबान की ओर तब गया जब न्यूयॉर्क में 2001 में हमला हुआ। अफगानिस्तान में तालिबान पर आरोप लगाया गया कि उसने ओसामा बिन लादेन और अल कायदा को पनाह दी है जिसे न्यूयॉर्क हमलों का दोषी बताया जा रहा था।'
इसके बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया। करीब दो दशक तक अमेरिकी और नाटो सेना ने अफगानिस्तान पर स्थिति संभाली। हालांकि, 2021 से फिर तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा जमा लिया। वहीं, अफगानिस्तान के बाकी राजनेता देश छोड़कर भाग चुके हैं।