अपनी टीम के श्रीलंका दौरे से पहले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने कहा है कि श्रीलंका का आर्थिक भविष्य चीन के पहलू से तय होगा। विश्लेषकों के मुताबिक इसका अर्थ यह है कि श्रीलंका जब तक चीन को अपने कर्ज को रिस्ट्रक्चर करने (चुकाने पर छूट देने) पर राजी नहीं करता, आईएमएफ से उसे सहायता नहीं मिलेगी। आईएमएफ की टीम इस महीने के आखिर में श्रीलंका का दौरा करेगी।
आईएमएफ ने श्रीलंका को जो संदेश भेजा है, उसमें चीन का सीधे नाम नहीं लिया गया है। लेकिन विश्लेषकों के मुताबिक उसमें कही गई बात का मतलब राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे सरकार पर इस बात के लिए दबाव बनाना ही है कि वह चीन को कर्ज भुगतान में छूट देने के लिए तैयार करे। आईएमएफ ने कहा है- ‘श्रीलंका पर मौजूद कर्ज सुरक्षित नहीं है इसलिए आईएमएफ का कार्यकारी बोर्ड तभी श्रीलंका को सहायता देने के कार्यक्रम को मंजूरी देगा, जब श्रीलंका के कर्जदाता उसे आश्वस्त कर सकें, कि उसे दिया जाने वाला कर्ज सुरक्षित है।’
आईएमएफ का संदेश मिलने के बाद विक्रमसिंघे ने चीन से आग्रह किया कि कर्ज राहत के मामले में वह अपने रुख में बदलाव लाए। वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा- ‘हमने चीन सरकार को सूचित किया है कि उसे कर्ज को रिस्ट्रक्चर करना होगा। जरूरत इस बात की है कि हमारे सभी कर्जदाता समान भाषा वाले पत्र पर दस्तखत करें। निसंदेह चीन ने इस मामले में अलग रुख अपनाया है, इसलिए यह प्रश्न खड़ा होता है कि बाकी कर्जदाताओं के साथ किस तरह का समझौता हो सकता है, जो चीन को भी पसंद आए।’
विशेषज्ञों की राय है कि आईएमएफ ने श्रीलंका को मदद देने के सवाल को चीन के पाले में डाल दिया है। कोलंबो स्थित वित्तीय कंसल्टैंसी एजेंसी जेपी सिक्योरिटीज के महानिदेशक मुर्तजा जफीरजी ने कहा- ‘श्रीलंका को चीन को इस बात के लिए राजी करना होगा कि वह अपने कर्ज में छूट दे।’ श्रीलंका की कुल अर्थव्यवस्था 81 बिलियन डॉलर की है। उस पर से ज्यादा 14 बिलियन डॉलर का कर्ज पश्चिमी प्राइवेट निवेशकों का है। इसके बाद एशियन डेवलपमेंट बैंक और विश्व बैंक का कर्ज उस पर है। जापान, चीन और भारत का नंबर उसके बाद आता है।
श्रीलंका पर इस समय कुल कर्ज 51 बिलियन डॉलर का है, उसमें चीन का हिस्सा 9.95 बिलियन डॉलर है। फिलहाल श्रीलंका के विदेशी मुद्रा भंडार में 30 करोड़ डॉलर मौजूद हैं। यह ईंधन, अनाज और दवाएं खरीदने के लिए भी पर्याप्त नहीं है। ऐसे में मौजूदा हालत में उसके लिए कर्ज चुकाना नामुमकिन है। श्रीलंका ने बीते अप्रैल में खुद को डिफॉल्टर घोषित कर दिया था।
वेबसाइट निक्कई एशिया से बातचीत में विक्रमसिंघे ने श्रीलंका में बड़ी ताकतों की बढ़ रही खींचतान का जिक्र किया। उन्होंने कहा- ‘हिंद महासागर में भू-राजनीतिक स्थिति गरमा रही है। अब तक हम इससे खुद से अलग रखने में सफल रहे हैं। हमारा ध्यान कर्ज समस्या पर है, जिस पर हमारा नजरिया विशुद्ध रूप से आर्थिक है। लेकिन कर्ज संकट और राहत पर विचार के दौरान दूसरे देश मुद्दे उठाएंगे। इसके भू-राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं।’
श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति गोतबाया सितंबर के पहले हफ्ते में लौट सकते हैं स्वदेश
श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे थाईलैंड भागने के कुछ दिन बाद सितंबर के पहले सप्ताह में श्रीलंका लौटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। डेली मिरर के सूत्र ने बताया कि राजपक्षे के 2 या 3 सितंबर को स्वदेश लौटने की संभावना है। बता दें कि कोलंबो में बड़े पैमाने पर विरोध व प्रदर्शनों के बाद गोतबाया 13 जुलाई की सुबह श्रीलंका से भाग गए थे। देश में आर्थिक संकट से नाराज प्रदर्शनकारियों ने उनके आधिकारिक आवास और कार्यालय पर धावा बोल दिया था। उन्होंने सिंगापुर पहुंचने के बाद राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया था। वहां रहने के लिए 14 दिनों का यात्रा पास जारी किया गया था। इसके बाद पूर्व राष्ट्रपति 11 अगस्त को श्रीलंका सरकार के अनुरोध पर थाईलैंड पहुंचे। उनके मिरिहाना स्थित आवास पर कड़ी सुरक्षा मुहैया कराई गई है। हालांकि, थाईलैंड ने उन खबरों का खंडन किया है कि गोतबाया ने देश में शरण मांगी है।