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IMF: बांग्लादेश के आर्थिक चमत्कार की क्यों गायब हो गई है चमक? आईएमएफ 4.5 बिलियन डॉलर का कर्ज देने के लिए सहमत

Mon, 14 Nov 2022 12:25 AM IST
देव कश्यप वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ढाका।

सार

श्रीलंका और पाकिस्तान के बाद बांग्लादेश तीसरा दक्षिण एशियाई देश बना है, जिसे आईएमएफ के दरवाजे पर जाना पड़ा है। अमेरिका के नेशनल पब्लिक रेडियो (एनपीआर) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि 17 करोड़ आबादी वाले इस युवा देश के लिए दुनिया में आती मंदी से खुद को बचाए रखना संभव नहीं हुआ। 
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आईएमएफ। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) बांग्लादेश को 4.5 बिलियन डॉलर का कर्ज देने के लिए सहमत हो गया है। इसके लिए दोनों पक्षों में स्टाफ लेवल (कर्मचारी स्तर का) समझौता हो गया है। लेकिन इसके साथ ही विशेषज्ञों के बीच ये चर्चा छिड़ गई है कि आखिर बांग्लादेश को कर्ज लेने की नौबत क्यों आई? अभी कुछ समय पहले तक बांग्लादेश को विकास संबंधी कामयाबी के करिश्मे के रूप में देखा जाता था। इस कहानी ने कैसे कड़वा मोड़ ले लिया, जानकार यह सवाल उठा रहे हैं।

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पांच दशक पहले अस्तित्व में आए बांग्लादेश को विश्व बैंक ने अपनी एक रिपोर्ट में ‘विकास की प्रेरणादायक कहानी’ बताया था। उसने कहा था कि वस्त्र उद्योग की कामयाबी ने बांग्लादेश को उस आर्थिक स्थिति में पहुंचाया, जिससे वह करोड़ों को लोगों को गरीबी रेखा के ऊपर ला सका। खासकर बांग्लादेश के महिला कामगारों की सफलता उल्लेखनीय रही। इस दौरान बांग्लादेश में जीवन प्रत्याशा में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि नवजात शिशुओं की मृत्यु के मामलों में 90 प्रतिशत की गिरावट आई। 

अभी पिछले साल ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कहा था कि बांग्लादेश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) जल्द ही डेनमार्क और सिंगापुर से ज्यादा हो जाएगा। प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में वह पहले ही भारत से आगे निकल चुका है। विश्लेषकों के मुताबिक अपनी इन्हीं सफलताओं के कारण बांग्लादेश दुनिया भर में सुर्खियां बटोर रहा था। 
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लेकिन अब उसकी ये तमाम कामयाबियां खतरे में हैं। वैश्विक परिस्थितियों की उस पर जोरदार मार पड़ी है। इसी वजह से उसे आईएमएफ के आगे हाथ फैलाना पड़ा। इस तरह श्रीलंका और पाकिस्तान के बाद वह तीसरा दक्षिण एशियाई देश बना है, जिसे आईएमएफ के दरवाजे पर जाना पड़ा है। अमेरिका के नेशनल पब्लिक रेडियो (एनपीआर) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि 17 करोड़ आबादी वाले इस युवा देश के लिए दुनिया में आती मंदी से खुद को बचाए रखना संभव नहीं हुआ। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा की महंगाई के कारण वह भी कई दूसरे देशों की तरह विदेशी मुद्रा की कमी का शिकार हो गया। 

विदेशों में काम करने वाले बांग्लादेशियों की वापस देश भेजी जाने वाली कमाई में भी भारी गिरावट आई है। उधर वस्त्र निर्यात का बाजार भी मंदा पड़ा है। इन सब कारणों ने कुछ महीनों के अंदर ही बांग्लादेश की कामयाबियों पर पानी फेर दिया है। लंदन स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स में अर्थशास्त्री फारिया नईम ने एनपीआर से कहा- ‘विश्व अर्थव्यवस्था में मौजूदा अस्थिरता के कारण बांग्लादेश में हालात बद से बदतर होते गए हैँ।’ 

बांग्लादेश के आर्थिक विशेषज्ञों ने कहा है कि देश के वस्त्र उद्योग पर पहली मार कोरोना महामारी की पड़ी। उस दौरान लॉकडाउन के कारण कम से कम तीन महीने कारखाने बंद रहे। इससे दस लाख लोगों की नौकरी चली गई। आमदनी ना होने के कारण उनके परिजन भुखमरी का शिकार होने लगे। अभी महामारी से राहत मिलने की शुरुआत हुई ही थी कि यूक्रेन युद्ध ने हालात बिगाड़ दिए। मजदूर संगठन- बांग्लादेश गारमेंट वर्कर्स सोलिडॉरिटी की अध्यक्ष तस्लीमा अख्तर के मुताबिक अब कर्मचारियों को ज्यादा समय काम करने के बावजूद ओवरटाइम नहीं मिल रहा है। इस कारण मौजूदा महंगाई के बीच उनके लिए गुजारा चलाना मुश्किल हो गया है। 

विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि आईएमएफ का कर्ज पाने के लिए बांग्लादेश को कुछ कठिन सुधार लागू करने होंगे। उसका खराब असर श्रमिक वर्ग और आम लोगों पर पड़ेगा। इससे जीवन स्तर और मानव विकास के मोर्चों पर हासिल हुई कामयाबियां प्रभावित होंगी। फारिया नईम ने कहा- ‘ये ऐसे हालात हैं, जिनका अनुमान नहीं लगाया जा सकता था। इन सबका परिणाम यह हुआ है कि बांग्लादेश को मुश्किल वक्त से गुजरना पड़ रहा है।’

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