मास्क पहनने से कोरोना वायरस के संक्रमण में बचाव होता है या नहीं, जब से ये महामारी आई तब से इस पर विवाद रहा है। अब ये बहस डेनमार्क में हुए एक अध्ययन से फिर उठी है। इस अध्ययन से जुड़े रहे शोधकर्ताओं का कहना है कि मास्क से उसे पहनने वाले व्यक्ति का कोई बचाव नहीं होता। लेकिन ये धारणा बहुत से दूसरे अध्ययनों के नतीजों से मेल नहीं खाती। कई अध्ययनों का यह नतीजा रहा है कि मास्क से पहनने वाले और उसके पास मौजूद दूसरे लोगों का भी बचाव होता है।
डेनमार्क का अध्ययन 'एनल्स ऑफ इंटरनल मेडिसिन' नामक जर्नल में छपा है। इसमें यह माना गया है कि मास्क से उसे पहनने वाले व्यक्ति से दूसरों तक वायरस का संक्रमण नहीं होता। लेकिन जिस व्यक्ति ने उसे पहना है, उसे कोई लाभ होता है, इसके प्रमाण नहीं हैं। लेकिन पिछले ही हफ्ते अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) ने कहा था कि मास्क से उसे पहनने वाले व्यक्ति की भी रक्षा होती है।
डेनमार्क के अध्ययन की कई हलकों में कड़ी आलोचना हुई है। आलोचकों ने ध्यान दिलाया है कि इस अध्ययन में शामिल किए गए सैंपल ऐसे नहीं हैं कि इसके निष्कर्ष को गंभीरता से लिया जाए। आलोचकों का कहना है कि डेनमार्क में कोरोना वायरस का संक्रमण काफी कम है और वहां लोग आम तौर पर मास्क नहीं पहन रहे हैं। जबकि अमेरिका में, जहां कोरोना वायरस संक्रमण के अब तक सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं, अब वो लोग भी मास्क की वकालत करने लगे हैं, जो पहले इसे पहनना बेमतलब मानते थे।
अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स के डाटाबेस के मुताबिक अमेरिका के लगभग 40 राज्यों में मास्क पहनना अनिवार्य बनाया जा चुका है। अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शन के निदेशक डॉ. एंथनी फाउची ये सलाह दे चुके हैं कि पूरे देश में मास्क पहनना अनिवार्य किया जाए। निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने इस सिफारिश का समर्थन किया है।
अमेरिका में सीडीसी के पूर्व निदेशक और अब रिसोल्व टू सेव लाइव्स ग्रुप के प्रमुख डॉ. थॉमस फ्रिडेन ने कहा है कि इसमें अब कोई शक नहीं बचा है कि मास्क एक सोर्स कंट्रोल है, जो दूसरों तक संक्रमण पहुंचने से बचाता है। उन्होंने कहा कि सर्जिकल मास्क की तुलना में एन-95 मास्क ज्यादा प्रभावी पाए गए हैं। लेकिन सर्जिकल मास्क कपड़ों से बने मास्क से ज्यादा प्रभावी होते हैं।
अमेरिका में पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के बायो-स्टैटिशियन सुजेन एलनबर्ग ने कहा है कि मास्क पहनने वाले का भी दूसरों से फैलाए जाने संक्रमण से बचाव होता है। इन विशेषज्ञों का कहना है कि सोर्स कंट्रोल और मास्क पहनने वाले के बचाव में अंतर करना मुश्किल है। इन दोनों बातों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता।
डेनमार्क में कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपना अध्ययन अप्रैल से जून के बीच में किया। इस दौरान 6,024 की कोरोना जांच की गई और यह सुनिश्चित किया गया कि वे संक्रमित नहीं हैं। उसके बाद उनमें आधे को मास्क पहनने को दिया गया। बाकी से कहा गया कि सार्वजनिक स्थलों पर जाते वक्त वे मास्क ना पहनें। शोधकर्ताओं का कहना है कि अध्ययन के आखिर में देखा गया कि मास्क पहनने वाले 1.8 फीसदी लोग संक्रमित हो गए थे। जबकि मास्क ना पहनने वालों में 2.1 प्रतिशत संक्रमित हुए।
लेकिन आलोचकों का कहना है कि जिस समय ये अध्ययन हुआ, डेनमार्क की सिर्फ दो फीसदी आबादी कोरोना संक्रमण का शिकार हुई थी। तब से वहां सोशल डिस्टेंसिंग और बार-बार हाथ धोने के नियम का लोग पालन कर रहे थे। इसलिए इस माहौल में हुए अध्ययन के नतीजे को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जा सकता।