ये गांव एक पहाड़ी पर बसा है जिसके निचले हिस्से में अंगूरों के बाग हैं। हम इन्हीं में से एक बाग में गए जहां करीब दर्जन भर लोग नौकरी करते हैं। ये मनुक्यान परिवार का बाग है जो 900 वर्ग मीटर के बाग में अंगूर की खेती करते हैं। बाग के मालिक अनुशावन मनुक्यान 87 साल के हैं। वो अधिकतर अंगूर बेच देते हैं लेकिन कुछ से वोद्का नाम की शराब बनाते हैं। वे कहते हैं कि इस बाग से साल भर में तीन टन तक अंगूर की पैदावार होती है।
मनुक्यान की पोती आर्पाइन चौबीस साल की हैं और वे 17 अक्तूबर को ही यहां आई हैं। वे लाचिन में रहती थीं और उन्हें अपने परिवार के साथ वहां से जान बचा कर भागना पड़ा। उनके पास कपड़े लेने तक का वक्त नहीं था।
आर्पाइन कहती हैं, "युद्ध के कारण मुझे अपना घर छोड़ कर भागना पड़ा और यहां आना पड़ा। मेरे भाई ने मुझे फ़ोन कर बताया कि वो लोग हमारे गांव की तरफ आ रहे हैं इसलिए हम सवेरे 4 बजे ही घर छोड़ कर निकल पड़े।"
आर्पाइन के भाई जंग के मैदान में हैं। वो कहती हैं कि मेरे पिता भी जंग में जाना चाहते थे लेकिन उनकी उम्र के कारण उन्हें सेना में लिया नहीं गया। आर्पाइन ने येरेवान यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग से पढ़ाई की है, वो टीचर बनना चाहती थीं। अब वो अपने दादा-दादी के साथ खाचिक में रहती हैं और अंगूर में खेती में उनका हाथ बंटाती हैं। उनके अलावा उनके परिवार में आठ और सदस्य हैं जो लड़ाई के कारण यहां हैं।
'सीमा के पार भी दोस्ताना था'
अनुशावन का जन्म खाचिक गांव में ही हुआ था। उन्होंने येरेवान में एग्रोनॉमिस्ट की पढ़ाई की जिसके बाद वो अपने गांव लौट आए। जब अजरबैजान और आर्मीनिया सोवियत संघ का हिस्सा थे तब के दौर में वो यहां के स्थानीय सरकारी बाग में निदेशक थे।
वो नखचिवन की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि उन्होंने वहां भी कई दोस्त बनाए हैं। वो कहते हैं कि अजरबैजान के गांव येदजी से उनके दोस्त रुस्तम और उनका परिवार एक बार उनसे मिलने यहां आया था। वो याद करते हैं कि रुस्तम अपनी पत्नी और बच्चों को तीन दिन के लिए यहां छोड़ कर गए थे।
खुद अनुशावन कई बार सीमा पार कर रुस्तम और उनके परिवार से मुलाकात करने गए हैं। वे कहते हैं, "1987 में जब मेरी बेटी की शादी हुई थी उस वक्त शादी में आर्मीनियाई लोगों के मुकाबले अजरबैजानी लोग अधिक थे।"
अनुशावन कहते हैं कि एक बार नखचिवन के एक फार्मासिस्ट ने आधे घंटे में उनकी दवा का इंतजाम किया था और उसने उनसे दवा के पैसे भी नहीं लिए थे।
खाचिक गांव और नखचिवन के लोगों के बीच अच्छे व्यापार संबंध हैं। खाचिक के लोग उन्हें अंगूर बेचते हैं तो वहां के लोग यहां सेब बेचते हैं। कार के कलपुर्जों के लिए भी अजरबैजान में रहने वाले इसी तरफ आते हैं।
अनुशावन याद करते हैं कि साल 1991 में नागोर्नो-काराबाख को लेकर शुरू हुए तनाव से पहले यहां अजरबैजानी उनके पड़ोसी हुआ करते थे।
वे कहते हैं, "वो गांव छोड़ कर चले गए। मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की। मैंने उन्हें बताया कि मैं उनसे उम्र में बड़ा हूं और मुझे उनके हमारे साथ रहने से कोई दिक्कत नहीं, लेकिन वो थोड़ा युवा थे। युवा ये बात नहीं समझते। वो चले गए। मैंने उन्हें फिर कभी यहां नहीं देखा।" नागोर्नो काराबाख में जारी लड़ाई को वो "बुरी चीज" कहते हैं।
वो कहते हैं, "एक इंसान को कभी किसी दूसरे इंसान की जान नहीं लेनी चाहिए। इस सदी में लोगों की बुद्धिमत्ता में काफी विकास हुआ है, वो सोचने में सक्षम हैं ऐसे में उन्हें एक दूसरे को नहीं मारना चाहिए। रूसी, आर्मीनियाई और अजरबैजानी सभी लोगों को शांति से मिलजुल कर रहना चाहिए। युद्ध का कोई तुक ही नहीं है।"
अनुशावन की पत्नी रिम्मा 84 साल की हैं। उनका जन्म खाचिक में हुआ था और वो अपने पति के साथ अंगूर के बागों में काम करती हैं। रिम्मा कहती हैं कि 1990 के दशक में जो युद्ध हुआ था उसमें खाचिक के छह लोग मारे गए थे। वो सभी आम नागरिक थे।
वो कहती हैं उस दौरान गांव के जोरिक पोगोश्यान नाम के एक व्यक्ति घास काटते हुए सीमा के करीब चले गए थे। उन्हें अजरबैजानी सेना ने कैद कर लिया और कई महीनों तक कैद में रखा। जब युद्धबंदियों की अदलाबदली हुई उस वक्त उन्हें कैद से छोड़ा गया। वो बताती हैं कि खाचिक में अभी भी पोगोश्यान की जमीन है लेकिन वो अब येरेवान में रहते हैं।
नागोर्नो-काराबाख को लेकर हुए विवाद से पहले रिम्मा, अजरबैजान के गांव येदजी में काम करती थीं। वो सवेरे वहां जाती थीं, पशुओं की देखभाल करती थीं और शाम को वापस अपने गांव आ जाती थीं। रिम्मा कहती हैं कि उन्हें युद्ध से डर लगता है लेकिन वो गांव छोड़ कर जाना नहीं चाहतीं। वो कहती हैं कि 1990 में हुई लड़ाई में भी गांव के अधिकतर लोग यहीं थे। हालांकि उन्हें डर था कि दुश्मन गांव पर कब्जा कर सकता है।
वो कहती हैं, "रात के वक्त भी हम दरवाजे बंद नहीं करते थे। लेकिन अब हम दरवाजों पर ताला लगाते हैं और शाम के बाद बत्ती भी नहीं जलाते। हमें डर है कि वो यहां आ जाएंगे। हम गांव नहीं छोड़ना चाहते। हम एक दूसरे से दूर नहीं होना चाहते।"
बाग से लौटते वक्त हमारी मुलाकात एक और महिला से हुई। उन्होंने बताया कि उन्होंने 22 सालों तक येरेवान टीवी में काम किया है। उन्होंने हमें बताया कि अब वो कई सालों से सेब की खेती कर रही हैं।
खाचिक के घर के बरामदे से हमें वो पहाड़ी दिखती है जो आर्मीनिया और अजरबैजान की सीमा से थोड़ी दूर तुर्की में हैं। ये है माउंट अरारात। जिसके चारों तरफ चार देश हैं। एक तरफ तुर्की है तो एक तरफ आर्मीनिया, एक तरफ अजरबैजान और एक तरफ ईरान है।
आर्मीनिया में हमने तीन सप्ताह बिताए, लेकिन यही एक जगह थी जहां लोगों ने अंगूर, सेब और खेती की बात की, लेकिन यहां किसी से युद्ध की बात नहीं की।