अगर ये कानून पास हो जाता तो इससे चीन को उन क्षेत्रों में संदिग्धों को प्रत्यर्पित करने की अनुमति मिल जाती, जिनके साथ हांगकांग के समझौते नहीं हैं। जैसे संबंधित अपराधी को ताइवान और मकाऊ भी प्रत्यर्पित किया जा सकता।
हांगकांग के लोग इस कानून का जमकर विरोध कर रहे थे। वो सरकार द्वारा कानून को निलंबित किए जाने के बाद भी नहीं थमे, उनका कहना था कि इसे पूरा तरह से खत्म कर दिया जाए। ऐसा इसलिए क्योंकि इन लोगों का मानना है कि अगर ये कानून कभी भी पास होता है तो हांगकांग के लोगों पर चीन का कानून लागू हो जाएगा। जिसके बाद चीन मनमाने ढंग से लोगों को हिरासत में ले लेगा और उन्हें यात्नाएं देगा।
लोगों को अब हांगकांग सरकार पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं रहा है। बीते कुछ सालों से सरकार के लिए लोगों में अविश्वास काफी बढ़ गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि वो बीजिंग के प्रभाव में आकर फैसले ले रही है। जिसके चलते लोग डरे हुए हैं कि बीजिंग गलत तरीके से इस कानून का लोगों के खिलाफ इस्तेमाल करेगा।
चीन से क्यों गुस्सा हैं हांगकांग वासी?
बात है साल 1997 की। तब हांगकांग को चीन के हवाले कर दिया गया था। उस वक्त बीजिंग ने 'एक देश-दो व्यवस्था' की अवधारणा के तहत कम से कम 2047 तक लोगों की स्वतंत्रता और अपनी कानूनी व्यवस्था को बनाए रखने की गारंटी दी थी। लेकिन ऐसा ज्यादा समय तक नहीं चला।
हांगकांग में 2014 में 79 दिनों तक चले 'अंब्रेला मूवमेंट' के बाद चीनी सरकार ने लोकतंत्र का समर्थन करने वाले लोगों पर जमकर कार्रवाई की। इस आंदोलन के समय चीन की सरकार से कोई सहमति नहीं बन पाई थी। विरोध प्रदर्शन करने वाले लोगों को जेल में डाल दिया गया था। आजादी का समर्थन करने वाली एक पार्टी पर प्रतिंबध लगा दिया गया था।
हांगकांग की सरकार ने इस कानून को प्रस्तावित करते हुए तर्क दिया था कि अगर इसे जल्द से जल्द पारित नहीं किया गया, तो हांगकांग के लोगों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। ये जगह अपराधियों का अड्डा बनकर रह जाएगी। सरकारी अधिकारियों का कहना था कि ये नया कानून केवल गंभीर अपराध करने वालों पर ही लागू होगा। जिसमें कम से कम सात साल की सजा का प्रावधान है।