पाकिस्तान सरकार
बसंत कौर का नाम भी बदलकर मरियम हो गया। कुछ साल बाद ही उनके दूसरे शौहर की भी मौत हो गई। लेकिन लंबे समय तक बसंत कौर ने अपने बच्चों को उनके घर, पैतृक जमीनों के बारे में कुछ भी नहीं बताया। उन्हें डर था कि कहीं जमीन की मांग करने पर पाकिस्तान सरकार उनके बच्चों को गिरफ्तार कर भारत को न सौंप दे। साल 1971 में जब उनका पहला पोता हुआ तो उन्होंने अपने बड़े बेटे को सारा किस्सा सुनाया। साल 1997 में बसंत कौर का देहांत हो गया। साल 1973 में उनके जिस बड़े बेटे ने जमीन का मुकदमा दायर किया था, वो भी साल 2009 में चल बसे। उनके बाद से बसंत कौर का पोता मुनीर शेख ही कोर्ट में ये केस लड़ रहा है।
भूमि विवाद पर फैसला
कश्मीर में दोनों तरफ, भले ही मामला भारत का हो या पाकिस्तान का, खाली पड़ी जमीन को सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया था। पाकिस्तान के मशहूर वकील मंजूर गिलानी बताते हैं कि पाकिस्तान में ऐसे मामलों के निपटारे के लिए एक अलग कोर्ट बनाया गया है। ये कोर्ट ही ऐसी संपत्तियों की रखवाली का जिम्मेदार है। साथ ही कश्मीरी शरणार्थी परिवारों के भूमि विवाद पर फैसला देने की ताकत रखता है। ये कोर्ट भूमि विवाद के मामलों से भरा पड़ा है क्योंकि भ्रष्ट अफसरों की मदद से जाली कागजात लगाकर मुकदमे दायर करने वालों की भी संख्या काफी है।
इस्लाम कबूल किया...
मंजूर गिलानी कहते हैं, "आदर्श स्थिति तो ये है कि जब जमीन का सही मालिक उस पर दावा करने के लिए सामने आए, भले ही वो शरणार्थी है, उसे जमीन दे दी जाए। लेकिन यहां मामला जटिल है क्योंकि यहां मिल्कियत का ढांचा बदल चुका है।" "फिर कोर्ट रूम में उन लोगों की सुनवाई भी हल्की होती है जिन्होंने धर्म बदलकर इस्लाम कबूल किया है। कई वजहों में से शायद एक वजह ये भी रही होगी कि 45 साल से चल रहा बसंत कौर और उनके पोते मुनीर शेख की जमीन का मामला अभी कहीं नहीं पहुंचा है।"
मुनीर के मामले में कोर्ट ने एक आदेश जारी किया था जिसमें एक एकड़ से ज्यादा जमीन उन्हें दिए जाने की बात थी। लेकिन इसे हासिल करना इसलिए आसान नहीं है क्योंकि इसके एक बड़े हिस्से पर वन विभाग का कब्जा है। कुछ पर शरणार्थियों के घर बने हुए हैं। बाकी पर स्थानीय प्रभावशाली लोगों का कब्जा है।
जाहिद शेख का मामला
वकील मंजूर गिलानी के अनुसार, "कोर्ट का वो आदेश जो मुनीर शेख के पास है, एक मजबूत टूल है। लेकिन तभी, जब आप एक प्रभावशाली शख्स हों। वरना ये कागज पर छपी एक आम चिट्ठी जैसा है।" पचास बरस के जाहिद शेख का मामला भी मुनीर शेख के जैसा ही है। मुजफ्फराबाद में जाहिद ने बीबीसी को अपनी पैतृक संपत्ति दिखाई, जहां अब दो मकान बनाए जा चुके हैं और उनके बीच एक कब्र भी है। जाहिद शेख कहते हैं कि उनकी संपत्ति इलाके के प्रभावशाली वकील की पत्नी के नाम कर दी गई है, जिन्होंने दावा किया था कि वो शरणार्थी हैं।
1947 में पश्तो कबायलियों के हमले के वक्त उनकी दादी ने नीलम नदी के पुल के नीचे छिपकर अपने परिवार को बचाया था। परिवार की उम्मीदें जाहिद शेख कहते हैं, "हमलावरों ने हमारा घर जला दिया था। हमारे परिवार ने मजदूरी करके पैसे जमा किए और घर को दोबारा तैयार किया।" साल 1959 में पूरा परिवार अपने घर वापस लौट पाया। जाहिद के पिता साल 1973 में चल बसे और उनकी दादी ठाकुरी का देहांत साल 2000 में हुआ। जाहिद को नहीं पता कैसे, लेकिन साल 1990 में उनके घर को खाली संपत्ति घोषित कर, किसी और के नाम कर दिया गया।
इसे लेकर जाहिद ने अपील की तो कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया। इसके बाद कोर्ट ने आदेश दिया कि जाहिद के दोनों घरों को गिरा दिया जाए। फिलहाल जाहिद और उनके परिवार की उम्मीदें कोर्ट में दाखिल की गई आखिरी अपील पर टिकी हैं। पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के प्रधानमंत्री को भेजी दया याचिका में भी जाहिद के परिवार ने ये निवेदन किया है कि अगर उन्हें उनके घर से बेदखल किया गया, तो उनके पास रहने के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। और अगर ऐसा किया जाता है तो बेहतर होगा कि उनके परिवार को भारत भेज दिया जाए क्योंकि उनका परिवार पाकिस्तान में रहा, उन्होंने
इस्लाम कबूल किया और इसी बात की उन्हें आज तक सजा मिल रही है।