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हिंदू मुसलमान तक बन गए, पर नहीं मिली पाकिस्तान में जमीन

Wed, 21 Mar 2018 01:00 PM IST
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
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पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में आज भी कई ऐसे परिवार हैं जो अपनी खोई संपत्ति को वापस पाने के लिए लड़ रहे हैं। 70 साल पहले जब भारत का विभाजन हुआ तो इन परिवारों की जमीनें, मकान और दुकान, सब पीछे छूट गए। जीवन सिंह उन्हीं में से एक हैं। उनके पास मुजफ्फराबाद शहर में नदी के पास आठ एकड़ से ज्यादा खेती की जमीन थी। इसके अलावा शहर के दक्षिण-पूर्व में स्थित एक गांव में उनकी इससे भी ज्यादा जमीन थी, जहां वो नाशपाती, सेब, गेहूं और मक्के की खेती करते थे।

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जीवन सिंह के पास शहर में कई दुकानें भी थीं। लेकिन आज जीवन सिंह के पोते बटाई-चौथाई पर खेती करते हैं और मजदूर बनकर रह गए हैं। जिस जमीन पर जीवन सिंह का परिवार अपना दावा ठोकता है वो दशकों पुरानी कानूनी लड़ाई में फंसी हुई है और वो लड़ाई 1947 में बंटवारे के बाद शुरू हुई।
ब्रिटिश भारत (भारत-पाकिस्तान) के राजनीतिक बंटवारे के बाद भड़की धार्मिक हिंसा में कम से कम 10 लाख लोग मारे गए थे और करीब सवा करोड़ लोगों को घर-बार छोड़कर विस्थापित होना पड़ा था। पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू और सिख भारत चले आए और उनके पीछे जो जमीनें छूट गईं, उन्हें 'खाली संपत्ति' घोषित कर दिया गया। भारत ने पाकिस्तान चले गए मुसलमानों की जमीन के साथ भी यही किया।
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गैर-मुस्लिम आबादी

लेकिन बंटवारे के दौरान कश्मीर के जिन बाशिंदों ने अपने घर छोड़े, उनमें से ज्यादातर ने किसी देश को नहीं चुना, बल्कि वो भारत और पाकिस्तान के नियंत्रण वाले कश्मीरी इलाकों में बने शरणार्थी कैंपों में चले गए थे। कुछ हिंदू जो पाकिस्तान के निंयत्रण वाले कश्मीर में थे, वो वहीं रहे और उन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया। लेकिन सत्तर साल बाद भी पाकिस्तान में रह रहे इन कश्मीरी हिंदुओं को उनकी जमीनें नहीं मिल पाई हैं। जीवन सिंह के परिवार के पास अब ले देकर जो है, वो है अदालत का एक फैसला जिसमें कहा गया है कि जीवन सिंह का एक एकड़ से ज्यादा जमीन पर हक बनता है।

साल 1947 में ही उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान के पश्तो कबायलियों ने कश्मीर से भारत का कब्जा हटाने के लिए हमला किया था। उस वक्त उनका सबसे बड़ा लक्ष्य भारत की गैर-मुस्लिम आबादी ही थी। हमले में कई हिंदू और सिख परिवार मारे गए थे। जो बचे थे उन्हें बाद में पाकिस्तान सरकार ने भारत सरकार के साथ 'सिटिजन एक्सचेंज' प्रोग्राम के तहत भारत भेज दिया था। उसके बाद इन लोगों की तकरीबन दो लाख एकड़ इलाके में फैली जमीन को पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर घोषित कर दिया गया। साथ ही आदेश किए दिए कि इस जमीन को जरूरतमंद लोगों के बीच बांट दिया जाए।

कबायली हमलावर

21 अक्टूबर, 1947 की सुबह जब पश्तो कबायलियों के हमले की खबर आई तो जीवन सिंह के पास अपनी पत्नी और तीन बच्चों की जान बचाने के लिए उन्हें पास के गुरुद्वारे में छिपाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। जीवन सिंह के पोते मुनीर शेख, जो अब खुद 40 वर्ष के हैं, उन्होंने उस दिन की घटना के बारे में कई बार अपने पिता से सुना है। वो बताते हैं कि उनके दादा पूरे परिवार को गुरुद्वारे में छिपाकर, बाकी सिख पुरुषों के साथ शहर को बचाने के लिए निकले थे। 

लेकिन उस दिन के बाद जीवन सिंह कभी नहीं लौटे। जब कबायली हमलावर श्रीनगर की ओर बढ़े गए तो जीवन सिंह की पत्नी बसंत कौर अपने पति को ढूंढने निकलीं। बसंत कौर ने देखा कि उनके तहस-नहस हो चुके घर में लाशें भरी पड़ी हैं। इसके बाद ये मानते हुए कि उनके पति की हत्या हो चुकी है, बसंत कौर मुजफ्फराबाद से करीब 18 किलोमीटर उत्तर में स्थित परसोनचा गांव में जा बसीं। उनके लिए बच्चों की सुरक्षा सबसे जरूरी थी, इसलिए उन्होंने इस्लाम कबूल किया और गांव के एक बूढ़े किसान से ब्याह करने को भी राजी हो गईं।

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इस्लाम कबूल किया फिर भी मिली सजा

पाकिस्तान सरकार

बसंत कौर का नाम भी बदलकर मरियम हो गया। कुछ साल बाद ही उनके दूसरे शौहर की भी मौत हो गई। लेकिन लंबे समय तक बसंत कौर ने अपने बच्चों को उनके घर, पैतृक जमीनों के बारे में कुछ भी नहीं बताया। उन्हें डर था कि कहीं जमीन की मांग करने पर पाकिस्तान सरकार उनके बच्चों को गिरफ्तार कर भारत को न सौंप दे। साल 1971 में जब उनका पहला पोता हुआ तो उन्होंने अपने बड़े बेटे को सारा किस्सा सुनाया। साल 1997 में बसंत कौर का देहांत हो गया। साल 1973 में उनके जिस बड़े बेटे ने जमीन का मुकदमा दायर किया था, वो भी साल 2009 में चल बसे। उनके बाद से बसंत कौर का पोता मुनीर शेख ही कोर्ट में ये केस लड़ रहा है।

भूमि विवाद पर फैसला

कश्मीर में दोनों तरफ, भले ही मामला भारत का हो या पाकिस्तान का, खाली पड़ी जमीन को सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया था। पाकिस्तान के मशहूर वकील मंजूर गिलानी बताते हैं कि पाकिस्तान में ऐसे मामलों के निपटारे के लिए एक अलग कोर्ट बनाया गया है। ये कोर्ट ही ऐसी संपत्तियों की रखवाली का जिम्मेदार है। साथ ही कश्मीरी शरणार्थी परिवारों के भूमि विवाद पर फैसला देने की ताकत रखता है। ये कोर्ट भूमि विवाद के मामलों से भरा पड़ा है क्योंकि भ्रष्ट अफसरों की मदद से जाली कागजात लगाकर मुकदमे दायर करने वालों की भी संख्या काफी है।

इस्लाम कबूल किया...

मंजूर गिलानी कहते हैं, "आदर्श स्थिति तो ये है कि जब जमीन का सही मालिक उस पर दावा करने के लिए सामने आए, भले ही वो शरणार्थी है, उसे जमीन दे दी जाए। लेकिन यहां मामला जटिल है क्योंकि यहां मिल्कियत का ढांचा बदल चुका है।" "फिर कोर्ट रूम में उन लोगों की सुनवाई भी हल्की होती है जिन्होंने धर्म बदलकर इस्लाम कबूल किया है। कई वजहों में से शायद एक वजह ये भी रही होगी कि 45 साल से चल रहा बसंत कौर और उनके पोते मुनीर शेख की जमीन का मामला अभी कहीं नहीं पहुंचा है।"

मुनीर के मामले में कोर्ट ने एक आदेश जारी किया था जिसमें एक एकड़ से ज्यादा जमीन उन्हें दिए जाने की बात थी। लेकिन इसे हासिल करना इसलिए आसान नहीं है क्योंकि इसके एक बड़े हिस्से पर वन विभाग का कब्जा है। कुछ पर शरणार्थियों के घर बने हुए हैं। बाकी पर स्थानीय प्रभावशाली लोगों का कब्जा है।

जाहिद शेख का मामला

वकील मंजूर गिलानी के अनुसार, "कोर्ट का वो आदेश जो मुनीर शेख के पास है, एक मजबूत टूल है। लेकिन तभी, जब आप एक प्रभावशाली शख्स हों। वरना ये कागज पर छपी एक आम चिट्ठी जैसा है।" पचास बरस के जाहिद शेख का मामला भी मुनीर शेख के जैसा ही है। मुजफ्फराबाद में जाहिद ने बीबीसी को अपनी पैतृक संपत्ति दिखाई, जहां अब दो मकान बनाए जा चुके हैं और उनके बीच एक कब्र भी है। जाहिद शेख कहते हैं कि उनकी संपत्ति इलाके के प्रभावशाली वकील की पत्नी के नाम कर दी गई है, जिन्होंने दावा किया था कि वो शरणार्थी हैं।

1947 में पश्तो कबायलियों के हमले के वक्त उनकी दादी ने नीलम नदी के पुल के नीचे छिपकर अपने परिवार को बचाया था। परिवार की उम्मीदें जाहिद शेख कहते हैं, "हमलावरों ने हमारा घर जला दिया था। हमारे परिवार ने मजदूरी करके पैसे जमा किए और घर को दोबारा तैयार किया।" साल 1959 में पूरा परिवार अपने घर वापस लौट पाया। जाहिद के पिता साल 1973 में चल बसे और उनकी दादी ठाकुरी का देहांत साल 2000 में हुआ। जाहिद को नहीं पता कैसे, लेकिन साल 1990 में उनके घर को खाली संपत्ति घोषित कर, किसी और के नाम कर दिया गया।

इसे लेकर जाहिद ने अपील की तो कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया। इसके बाद कोर्ट ने आदेश दिया कि जाहिद के दोनों घरों को गिरा दिया जाए। फिलहाल जाहिद और उनके परिवार की उम्मीदें कोर्ट में दाखिल की गई आखिरी अपील पर टिकी हैं। पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के प्रधानमंत्री को भेजी दया याचिका में भी जाहिद के परिवार ने ये निवेदन किया है कि अगर उन्हें उनके घर से बेदखल किया गया, तो उनके पास रहने के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। और अगर ऐसा किया जाता है तो बेहतर होगा कि उनके परिवार को भारत भेज दिया जाए क्योंकि उनका परिवार पाकिस्तान में रहा, उन्होंने इस्लाम कबूल किया और इसी बात की उन्हें आज तक सजा मिल रही है।
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