अखबार अरब न्यूज में छपी एक टिप्पणी में कहा गया है- ‘अगर ईरान अपने इस वादे पर कायम रहता है, तो यह तस्वीर बदल देने वाली घटना होगी, जिससे क्षेत्रीय शांति और प्रगति के ऐसे दौर की शुरुआत होगी, जैसा पिछले कई देशों में नहीं देखा गया।’
इस समझौते को संपन्न कराने में चीन ने जो भूमिका निभाई, उसे भी दूरगामी महत्त्व का माना जा रहा है। अरब न्यूज की इसी टिप्पणी में कहा गया है- ‘चीन इस भूमिका को निभाने की सबसे बेहतर स्थिति में था, क्योंकि उसके ईरान और सऊदी अरब दोनों से अच्छे रिश्ते हैं। फिर अमेरिका और यूरोप के विपरीत इस क्षेत्र में आक्रमण करने या उपनिवेशवाद में शामिल होने का उसका कोई इतिहास भी नहीं है। सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक है और चीन का स्वार्थ यह है कि यहां से तेल की सप्लाई बिना किसी बाधा के होती रहे।’
उधर ईरान के प्रमुख अखबार तेहरान टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट कहा है कि सऊदी अरब और ईरान के बीच मेलमिलाप कराने की पहल इराक और ओमान ने की थी, लेकिन चीन अपनी कूटनीति को गुप्त रखते हुए उससे आगे निकल गया। रिपोर्ट में कहा गया है- ‘ऐसा लगता है कि हाल में ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की हुई बीजिंग यात्रा की समझौते को संपन्न कराने में प्रमुख भूमिका रही।’
ईरान के राष्ट्रपति कार्यालय में प़ॉलिटिक अफेयर्स के उप प्रमुख मोहम्मद जमशिदी ने तेहतान टाइम्स से कहा- ‘एक बार फिर राष्ट्रपति रईसी की नीति सफल हुई है। बीजिंग में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई वार्ता के दौरान पश्चिमी के लिए कई रचनात्मक विचार आए और उन पर चर्चा हुई। अब उसका फल सामने आया है। अच्छे पड़ोसी वाले व्यवहार और बिरादराना नीतियों से यूरेशियाई एकता का रास्ता खुलेगा, जिससे बिना किसी विदेशी हस्तक्षेप के इस क्षेत्र में आर्थिक और सुरक्षा संबंधी लाभ मिलेंगे।’
ईरान के विदेश मंत्री हुसैन आमिर अब्दुल्लाहियान ने एक ट्वीट में कहा- ‘सऊदी अरब के साथ रिश्ते सामान्य होने से दोनों देशों, इस क्षेत्र और इस्लामिक दुनिया की क्षमताओं में भारी इजाफा होगा। ईरान की पड़ोस नीति सही दिशा में आगे बढ़ रही है। ईरान की कूटनीतिक प्रणाली आगे और क्षेत्रीय कदम उठाने के लिए सक्रिय है।’
सऊदी अरब ने 2016 में ईरान से कूटनीतिक संबंध तोड़ लिए थे। उस समय तेहरान में सऊदी दूतावास में नाराज भीड़ घुस गई थी, जिससे दोनों देशों के संबंध बेहद बिगड़ गए। अप्रैल 2021 में दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने की शुरुआत हुई। इसमें इराक के साथ-साथ ओमान भी खास भूमिका निभा रहा था। लेकिन अब इसका श्रेय चीन मार ले गया है।