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गृह युद्ध के बाद से बर्बाद हो चुके हैं सीरिया के शहर

Sat, 12 Mar 2016 04:42 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • गृह युद्ध के बाद से हुआ सीरिया के शहरों का ऐसा हाल।
  • दुनिया की कई पुरानी ईमारतों से सजा हुआ करता था सीरिया।
  • आधी हो चुकी है देश की आबादी।
  • जिंदगी बचाने के लिए दर दर भटक रहे हैं सीरिया के शरणार्थी।
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एलेपो की प्राचीन उम्मायद मस्जिद - फोटो : daily mail
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विस्तार
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सीरिया में गृह युद्ध को पिछले कई सालों का सबसे खतरनाक गृह युद्ध कहा जा सकता है। इस युद्ध को शुरू हुए पांच साल होने जा रहे हैं लेकिन अब तक स्थिति में सुधार की गुंजाइश तो दूर, माहौल बद से बदतर ही हो रहा है।
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जिस देश में कई शताब्दियों पुरानी इमारतें और धरोहरें हुआ करती थीं, वो आज मलबे, पत्थरों और मिट्टी में धंसकर रह गया है।

इन्हीं 5000 सालों पुरानी इमारतों में लोग नौकरी करने आते थे, बाजारों में खरीदारी करते थे और मस्जिदों में इबादत होती थी। आज वो लोग अपने ही घर से बेघर हैं और जिंदा रहने की जद्दोजहद में लगे हैं।

पिछले 5 सालों में आधी हो गई सीरिया की आबादी

एलेपो का सॉक बाब अंताक्या - फोटो : daily mail
सीरिया में हुए युद्ध ने पीड़ियों को बर्बाद कर दिया है। इस युद्ध के दौरान 1,30,000 से भी ज्यादा जिंदगियां तबाह हुईं। पिछले कुछ सालों से सीरिया के लोग लगातार पड़ोसी देशों में पलायन करने को मजबूर हैं।

यूएन की 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक सीरिया की आबादी 1 करोड़ 6.6 लाख रह गई है जो युद्ध से पहले 2 करोड़ 20 लाख हुआ करती थी।

यूएन के मुताबिक 40 लाख शरणार्थी दूसरे देशों में गए हैं। वहीं 70 लाख ऐसे भी हैं जो अपने ही देश में इधर से उधर भटक रहे हैं। कई कई परिवार बंदूकधारियों से बचकर रात में मीलों चल कर बॉर्डर पार करते हैं। हर साल इन शरणार्थियों का आंकड़ा बढ़ता जाता है। 2012 में 1,00,000 शरणार्थी यूएन हाई कमिशन ऑफ रिफ्यूजी में पंजीकृत हुए थे। 

2013 में ये आंकड़ा 8,00,000 हो गया था। यूएन का अनुमान है कि 2016 के अंत तक ये आंकड़ा 40 लाख 7 हजार हो जाएगा।

दूसरे देशों में जिंदगी तलाश रहे हैं शरणार्थी

80% कम हो गया बिजली का उपयोग - फोटो : Xi Li and Deren Li Wuhan University China
यूएन का ये भी मानना है कि शरणार्थियों की ये संख्या इससे भी ऊपर हो सकती है। इस बात का सबूत रात में सैटेलाइट से ली गई ये तस्वीर है जिसमें दिख रहा है कि युद्ध शुरू होने के बाद से बिजली का उपयोग 80% तक घट गया। 

अफसोस की बात ये भी है कि जो लोग तुर्की, लेबनान, जॉर्डन और इराक में शरण लेने जाते हैं उनकी वहां भी कोई पहचान नहीं होती। इसलिए कानूनन वे वहां नौकरी भी नहीं कर सकते।

हवाई और जमीनी हमलों ने इस कदर कहर बरसाया कि इंसानों और धरोहरों का नामोओनिशान भी बड़ी मुश्किल से ढूंढते मिलता है।

ध्वस्त हो चुके हैं सदियों पुराने महल

एलेपो की अल मदीना सॉक बाजार - फोटो : daily mail
एलेपो शहर में कभी दुनिया का सबसे पुराना बाजार हुआ करता था जो अब तहस-तहस नहस हो चुका है। सीरिया के दूसरे शहर होम्स का भी कुछ ऐसा ही हाल है। यहां मध्याकालीन दौर का दुनिया का सबसे चर्चित महल हुआ करता था 'क्राक डेस शेवलियर्स'।

लेकिन जेट और तोपों से हुए हमलों के बाद से, पहाड़ी पर स्थित ये महल ध्वस्त हो चुका है। शहर की सड़कें, जहां जिंदगी दौड़ा करती थी, अब खाली पड़ी हैं। 

राष्ट्रपति बशर अल-असद के वफादार सैनिक नागरिकों को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। घसीट घसीट कर हमला करते हैं और इसलिए लोगों तक जरूरी सेवाएं नहीं पहुंच पातीं। इन तस्वीरों को देख कर इसका अंदाजा लगाया जा सकता है कि सीरिया में जीवन के नाम पर कुछ नहीं बचा है।।
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अस्पतालों में न मरीज न डॉक्टर

एलोपो का अल किंदी अस्पताल - फोटो : daily mail
एलेपो का अल किंदी अस्पताल कभी मॉडर्न सेवाओं से युक्त हुआ करता था। लेकिन अब वहां न तो डॉक्टर हैं, न एंबुलेंस और न मरीज। हो भी कैसे, जब अस्पताल का ढांचा ही नहीं बचा। मई 2012 में डर्हम विश्वविद्यालय की पीएचडी छात्रा और 'ग्लोबल हेरीटेज नेटवर्क' की सदस्य एमा कनलिफ ने सीरिया में धरोहरों की हुई बर्बादी पर एक रिपोर्ट बनाई थी।

उन्होंने लिखा था कि कांस्य युग की कई सभ्यताओं ने, मिस्र, पर्शिया, रोम और अरब के लोगों ने और यहां तक कि यूरोप के धर्मयोद्धाओं ने सीरिया को ऐसी ऐसी इमारतें दी जो दुनिया में कहीं और नहीं पाई जातीं।

अब ये शहर सिर्फ ईंट-पत्थरों के ढेर बन कर रह गए हैं। हर दिन हजारों लोग छिप छिपा कर यहां से भागने की कोशिश करते हैं।
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