तेल की दौलत से मालामाल सऊदी अरब दुनिया भर के लाखों कामगारों की मंजिल रहा है, लेकिन आजकल वहां हजारों भारतीय मजदूर फाकाकशी को मजबूर हैं। सऊदी अरब में लगभग दस हजार लोग बेरोगजार हो गए हैं और उन्हें महीनों से वेतन नहीं मिला है। अब भारत सरकार से गुहार लगाने के सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं है। भारत सरकार ने तत्परता दिखाई। इन लोगों तक खाना पहुंचाया और हर मदद का वादा भी किया।
लेकिन जिस देश में लाखों विदेशी कामगार काम करते हैं, उनके हित और अधिकारों की रक्षा करने की क्या जिम्मेदारी वहां की सरकार पर नहीं आती है? मध्य पूर्व मामलों के जानकार और जेएनयू में प्रोफेसर कमाल पाशा कहते हैं, “वहां का लेबर मार्केट फ्री मार्केट कहा जाता है। आधिकारिक तौर पर सरकार इसमें शामिल नहीं है। ये काम कंपनियों को दिया गया है। मान लीजिए कोई कंपनी काम कर रही है तो उन्हें परमिट दिया जाता है कि वो इतने मजदूर, प्लंबर, मिस्त्री या इलेक्ट्रिशियन वो ले कर आ सकते हैं।”
वो बताते हैं, “सरकार का काम सिर्फ वीजा मंजूर करना है, फिर कंपनी मजदूरों से किस तरह का सलूक करती है, कितना वेतन देती है या फिर क्या करती है, इस बारे में सरकार कोई दखल नहीं देती है।” कहा तो यहां तक जाता है कि सऊदी अरब में सरकार वीजा नीलाम करती है और जो कंपनी सबसे ज्यादा पैसा देती है, उसे बड़ी संख्या में वीजा दिए जाते हैं। फिर यही कंपनियां भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, थाईलैंड या फिलीपींस जैसे देशों से अकसर एजेंटों के जरिए नौकरी पर लोगों को रखती हैं।
इनमें से कोई दूध पहुंचाता है, कोई अस्पतालों में सफाई करता है, कोई कूड़ा उठाता है, कोई बढई है, कोई प्लंबर और कोई नाई। इन लोगों के भेजे पैसे से न सिर्फ उनका परिवार चलता है, उनके देश का खजाना भी भरता है। सऊदी अरब में रहने वाले भारतीय भारत को हर साल अरबों डॉलर की रकम भेजते हैं। भारतीयों मजदूरों की मौजूदा समस्या को उनकी कंपनी की आर्थिक मुश्किलों से जोड़ कर देखा जा रहा है लेकिन सऊदी अरब में विदेशी कामगारों के शोषण के मामले तो अकसर सामने आते हैं।