दुबई को किसने बनाया? यहां रहने वाले प्रवासियों के बीच परदे के पीछे यह अंतहीन बहस का विषय है। इस विषय पर सार्वजिनक तौर से कोई बहस करने का जोखिम नहीं उठाता। उनके मन में डर बना रहता है कि कहीं उन्हें प्रशासन के क्रोध का सामना ना करना पड़े। अगर ये सवाल आप वहां रह रहे और काम कर रहे भारतीयों और अन्य दक्षिण एशियाई लोगों के सामने रखते हैं तो वो कहेंगे कि उन्होंने बनाया है।
यही सवाल स्थानीय अरबवासियों के सामने रखेंगे तो उनका जवाब होगा कि उनके नेताओं की दूरदर्शिता के कारण रेगिस्तान में एक चमकता हुए विश्वस्तरीय महानगर बना, जहां दुनियाभर के लोग कंधे से कंधे मिलाकर रहते हैं। दूसरी तरफ यही सवाल अगर आप यहां रह रहे अरबपतियों से पूछेंगे (जिनमें भारतीय भी शामिल हैं) तो उनका जवाब हो सकता है कि उनके बड़े निवेश और मेहनत से यहां विश्वस्तरीय इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया जा सका।
ये इस बात को अधिक रेखांकित करेंगे कि उनके पैसों से ही यहां इमारतें, फ्लाइओवर्स, सड़कें, ब्रिज और मेट्रो का निर्माण हुआ। ये आपको बताएंगे कि अगर ये अरबों का निवेश नहीं करते तो दुबई आज जैसा है वैसा नहीं होता। दुबई एक आधुनिकतम शहर है जहां कारोबार करना बहुत आसान है। इस शहर में गंगनचुंबी इमारतें हैं, जिनमें से एक है जानीमानी इमारत बुर्ज खलीफा। जाहिर है दुबई और अन्य छोटी रियासतें सम्मिलित रूप से संयुक्त अरब अमीरात का हिस्सा हैं।
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इन रियासतों को उनके संस्थापक शेख जायद बिन सुल्तान अल नाह्यान ने आधुनिक केंद्रो के रूप में विकसित किया। 33 साल शासन करने के बाद 2004 में उनका निधन हो गया था। दुनियाभर में उन्हें एक दूरदर्शी नेता के तौर पर देखा जाता है। उन्हें ब्रिटिश उपनिवेश के बाद विरासत में उन्हें काफी पिछड़ा हुआ देश मिला था, लेकिन 1971 में आजादी के बाद कुछ ही दशकों में उन्होंने इस जगह को ऐसा बना दिया कि अन्य अरब देशों की आंखों में ये चुभने लगा। लेकिन अगर यहां इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में अरबों डॉलर का निवेश नहीं होता तो शायद शेख जायद बिन सुल्तान अल नाह्यान सब कुछ अपने आप नहीं कर पाते।
भारत से भी हुआ निवेश
दुबई
बीते कुछ दशकों में दुबई में अरब के कई देशों से भारी निवेश आया है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यहां निवेश ब्रिटेन, फ्रांस और बाद में भारत से भी खूब हुआ है। मिसाल के तौर पर दुबई के केवल प्रॉपर्टी मार्केट में पिछले दो सालों में 90 अरब डॉलर का निवेश हुआ है। इनमें से ज्यादातर निवेश विदेशों से हैं, जिसमें भारतीय भी शामिल हैं। इस निवेश में भारतीयों का हिस्सा 12 फीसदी है।
कहा जाता है कि अरब के अमीरों, पश्चिमी देशों के नागरिकों और भारतीयों ने दुबई और संयुक्त अरब अमीरात को बनाया। यह सच भी हो सकता है, क्योंकि जब वो यहां बड़े-बड़े कारोबार स्थापित कर रहे थे तो सही मायनों में एक बड़ा जोखिम मोल ले रहे थे।
आखिर इन्हें पता कैसे था कि जोखिम लेना फायदे का सौदा साबित होगा। यहां निवेश करने वाले अपने मुनाफे को लेकर आश्वस्त थे, लेकिन व्यावहारिक रूप से सिंगापुर और शंघाई के बराबर दुबई को वैश्विक बिजनेस हब बनाने को लेकर संदेह होना लाजमी था। इन सारी बहसों के बीच यह तर्क भारी पड़ता है कि दुबई को भारतीयों और दक्षिण एशियाई लोगों ने बनाया। दुबई के असली हीरो तो वही हैं जिन्होंने अपने खून और पसीने से गगनचुंबी इमारतों को बनाया।
उन्होंने झुलसाने वाली धूप के बीच काम किया। फ्लाइओवर्स और मेट्रो बनाने के लिए हाड़तोड़ मेहनत की। ये काम करने वाले सभी भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान के मजदूर थे। ये अब भी यहीं हैं और चिलचिलाती धूप में वैसी ही मेहनत करते हैं। यहां करीब 20 लाख भारतीय मजदूर हैं। इन्हें देख कर आप आसानी से जान सकते हैं कि जब दुबई बन रहा था तो वो क्या कर रहे थे। ये लोग बिना कोई शिकायत कड़ी मेहनत करते रहे हैं।
आज दुबई रेत की दुनिया से बाहर निकल चुका है। यहां अब आकाश को चुनौती देती इमारतें हैं। शीशे की ऐसी इमारतें हैं जो सूरज और चांद की रोशनी से भी ज्यादा चमकती हैं। शायद ये वंचित भारतीय मजदूरों की कड़ी मेहनत के सबूत हैं। ये अपने परिवार और वतन से दूर किसी और मुल्क के निर्माण में लगे हैं। इस बात से हर कोई सहमत है कि दुबई को किसी एक ने नहीं बल्कि सभी ने मिलकर बनाया है।