इराकी सेना ने मोसुल से भले ही जिहादियों और आईएसआईएस के आतंकियों को खदेड़ दिया हो, लेकिन कई ऐसे ईसाई हैं जो वापस मोसुल लौटना नहीं चाहते हैं। उनका कहा है कि मोसुल ईसाइयों के लिए सुरक्षित नहीं है। इराक का यह शहर कभी लोगों से गुलजार हुआ करता था लेकिन आज चारों ओर वीराना छाया हुआ है।
उत्तरीय इराक के इस इलाके में रहने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि यहां ईसाइयों सुरक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। वह व्यक्ति अब इस शहर को छोड़ चुका है और यहां वापस नहीं आना चाहता है।
वहीं अरबील में रहने वाले एक व्यकित ने कहाना है कि अपना मुह बंद करके चुपचाप यहां पड़े रहने में ही भलाई है। 2014 में आईएसआईएस के मोसुल पर कब्जे के बाद 40 साल के इस अधेड़ को अपना शहर छोड़ना पड़ा था।
आईएस के आतंकियों के कब्जे के बाद मोसुल में रह रहे लगभग 35,000 ईसाइयों की जिंदगी मौत से भी बत्तर हो गई थी। उन्हें आतंकियों द्वारा अल्टीमेटम दिया गया था कि या तो वह अपना धर्म बदल कर इस्लाम को कुबूल कर ले और मुस्लिम न होने के कारण इस विशेष टैक्स भरे या फिर शहर छोड़ने तक अपनी जिंदगी को खतरे में डाले।
10 जुलाई को इराकी सरकार ने घोषणा की कि मोसुल पर उन्होंने अपना कब्जा जमा लिया है। एक लंबी लड़ाई के बाद सेना ने अपने शहर पर वापस कब्जा पा लिया है। लेकिन इस जंग में हजारों लाखों लोगों ने अपना घर खो दिया। बीते तीन सालों में जो लोग शहर छोड़कर गए वह कहीं और सेट हो गए हैं। बेहनाम का कहना है कि वह चाह कर भी अब वापस मोसुल नहीं लौट सकते हैं। बीते तीन सालों में उन्होंने अपनी जिंगदी को अलग तरीके से जीना सीख लिया है।